ऊ के रहे ?

ऊ के रहे ?

बिनिता चौधरी
ओजरिया रात, सक्कु ओर ओजरार, डश्यक समय, चक्ढौं चक्ढौं..मन्द्रक आवाजले मोर निंद नै परटहे । किहुसे बोलक बट्वाइक लाग टे सबजाने डश्या मन्नम व्यस्त रहिँट । बाबा मट्वार होके सुटल रहे, डाडु भइवन अपन सँघरियनसँगे नाच हेरे गैल रहिँट । डाई मामन् घर डश्या माने गैल रहे । मै अक्केली कोन्टीम ओन्ड्रल रहुँ । मोका डगर जोन्ह्यक ओजरार कोन्टीम झाँकटेहे, मानो महिन बलाइटा, अपनसँगे खेले । मैं उठ्लुँ खटियाहे घिरियाके मोकक् सोझे टन्लु ओ सुत्गैलुँ । निंद नै परल, मुरी उठाके मोका डगर बाहर हेरे लग्लुँ, आँखी सिधे जोन्ह्यक पर परल । निश्छल अनहारसे मुस्कानके रुपमे ओजरार फैलैटी चम्चमैटी पहिरनमे जोन्ह्या झलर–मलर टारैयनके बिच्चे मानो स्वर्गके परी सजसवँरके अपन सखीन्सँगे सयरमे निकरल बा ।
भरल–पुरल जोन्ह्याहे डेख्के केकर मन नै लल्चाई । सायद उहे मारे हुई उत्तरक कोन्वमसे बद्री आपन अलग–अलग आकृति बडलटी ढिरे–ढिरे आइल ओ जोन्ह्याहे अपन कोनामे नुक्वा लेहल । मै निरास हो गैलुँ । महिन लागल, केउ मोर मन मिल्ना संघरियाहे महिसे डुर कैडेहल । मै मनमने गरियाइ लग्लुँ कि टब्बेहेँ जोन्ह्यक ओजरार ढिरे ढिरे वाहर निकरे लागल । जानो कि उ महीसे आँख मिचौली खेलटा । कबु चारुओर ओजरार फेंके टे कवु अन्ढार कैके बद्रीक कोनामे नुक्जाए ।
‘बाबा’ कना आवाजले मै अपन कल्पनाके संसारसे बाहर आके हेरलु टे बाबा बेखवर होके सुटल रहे । मै उठके खटियामे वैठ्लु ओ डाईहे सम्झे लग्लु टे बुदीक कहलक बात याद आइल, “अरी हमार घर का खैना पिनक डारी बा, टरटिउहार आइठ टे अपन लैहर जाउँ जाउँ कैठे । घरेम आइल पहुनी पहुनन् मजासे खवाइक पिवाइक टे जब फे टाँग उठैले डेख्वो” । बुदीक जियट घरीम डाई कब्बु मामन् घर नै जाइक पाए । कबु–कबु केल जाए, उ फेर नानी डेरा ढैले रहे टब्बे किल । सकारे निंढपकाके, धन्धा उसारके जाए, फेन सन्झा बेरी निंढ्ना जुन आजाए । मामन् घर एल दुर फेर टे नै हो, कुल्वक ओँहपार दुई घर छोरके टे हो जे ।
जब टिउहार आए टे डाई दिनभर भन्सम डट्करल रहे । बुदी अँगना मनिक रुखुवाटिर बैठल डोना छेदे ओ फुईनसे बट्वाए । बिच बिचमे डाईहे गरीया लेहे । ‘अरी सेक्ले की नाइ भुँखे मुवा डारी आज बाबुन् हे’ । दुनीया डारीसे बेखबर डुनु फुईनके लर्का ओ हम्रे तीनु भइवा बहीन्या डोनियम् खैना बोक्ले अँगनामे नेँग–नेँग दिनभर कत्रा खाइ, जोखे नै सेक्जाई ।
जब रात होए, टब सक्कु जाने सुट्जाइँट टे डाई “बाबुरी, बाबुऽऽ निंदा गैले ? सुग्घुरसे सुट्, यी लवण्डी सुत्ती किल निंदा जाइठ ।” मोर मुरी सुहराए ओ कहे, “वहाँ टोर मामन् घर सक्कुजाने गल्गलाइठुइहीँ, जत्रे रात हुइट ओत्रे टोर नानीक् पुरान पुरान बात निकरठीस् । ओम्हे टोर छुट्की मौसी छप्या डार ठुइ टे सब जाने हहराइठुइहीँ” । डाईक हाँठ उस्टाके मै कहुँ– “ना बोल डाई, सुटे डे अइसिन निंड लागटा ।” मोर बात बिन ओनैले डाई आपन बात बरबराइल करे । कैना फे का करी बिचारी, सुख दुःखके बात बटुइया मनै फेर टे चाहल । बुदु मुअल टबसे घरक जिम्मेवारी सक्कु बाबक् मुरीमे रहीस । दिनभर खेतवाबारीमे काम करे । सिहरल साँझके जब घरे आए टे जाँरक मिझ्नी खाके सुटे, टब एकफाले सकारे उठे । सारी साह टे मै डाईक सँगे–सँगे रहुँ । सबजाने कहीट, पेट पोछ्नी छाई अइसीन छिहलाइल बटिन, डाईहे अक्को छोरे नै सेक्ना । हुइना फे हो दिनभर टे मै एहोर ओहोर खेल लिउँ, मने रातके भर डाईहे विना पकरले मोर निंद नै आए, अभिनटक नै आइठ ।
उहे मारे हुइ आज फेर मोर निंद नै आइठो । डाई टे कहटेहे “चोल छाई जाइ मामन् घर, काल्ह सकारे आजाबी । टीनाटावन सक्कु चिज पलि बा, एक भोक्टी जाँर छावडेव, टोर बाबा महटान घरसे डश्या मानके अइही टे खा पीके सुट्जैही ।” मै कलुँ– मै नै जैम टैं जा, वहाँ सक्कु जाने आइल हुइहीँ । अब्बे टे मामा खिझ्वाइ लग्हीँ, “भैने कैसिन डुल्हा लेबो, पैन्ट घल्नाहा कि लगौंटी, डुर की लग्गे, कुर्सीम बैठ्नाहा की हर जोत्नाहा ?’ का का हो का का मामा टे रुवइनाअस् कै डरठा । अस्टे बानी होके टे गाउँक मनै सोँग्या चौधरीयक् नाउँसे चिन्हठिन् ।
रात बह्रटी गैल । जोन्हिया मोर कोन्टीक मोकाओरसे विल्गाइ छोरडेहल, कोन्टी अन्ढार हो गैल । अंगनाओर जुन झन–झन ओजरार बिल्गाए । मै उठ्के अँगनाओर गैलु । टवाटिक ओजरार डेख्के डाईक ठेन जैनास लागे लागल । घरे मजाके बहरीम ढैल चप्पल घल्लुँ, लावा गटिया परलँु ओ ड्वार भट्काके चल्डेलुँ ।
गाउँमे नाटक हेरुइयनके चहलपहल रहे । हाली–हाली नेंग्टी डख्नक बाँसेठे पुग्लुँ टे लागल, केउ मोर पाछे–पाछे आइटा । मै अस्याइ अस कैलुँ टे केक्रो चालचुले नै । मोर जीउ ठरठराइ अस् करल । टबु पर आँखर मन कैके आगे बह्रलु । दुई तीन पैला का नेंग्लु फेरसे ओस्टे चाल । के हो कैहके नेंग्टी टिर्छेसे पाछेओर हेरेअस कैलु टे झुक्मुकाइट डेख्लु । मोर सास फुले लागल । मै आँख बन्द कैके डौरे लग्लु । जस्टे के मै डौरुँ, उ फे ओस्टेके डौरे । बिच–बिचमे मोर गटीया पकरके टाने अस करे । मै चिल्लैटी कब मामन्के अँगनामे पुग्लुँ, पटे नै चलल ।
के हो ? के हो ? का हुइल ? का हुइल ? आवाज सुनके मोर होस आइल । सक्हुन अँगनामे ठरह्याइल डेख्लु टे डरैटी ढिरेसे कलु “के जाने हो मही डुरुवाइटेहे” । मामक् छावा बर्का दादा “के हो रे ? केकर हिम्मत बा मोर बहिन्यक पिछा कैना ? खै केहोर भागल सारेक” कहटी गाउँओर चलगैल । माई भुन्भुनाइ लग्ली “ भैने फेन, लवण्डी मनै रातविरात अक्केली नेंग्ना कुछु हो ओ जाइट टे ?” बाबु ठपल–“ अइया डाई री, उहे डख्नक बाँसे ठन टे भुटुवा निकरठ कटिहुँन्”। सबके बात सुनके डाई कहल–“मै कटी टे रहुँ, चोल सँगे, मन्बे नै करल, आब नै अक्केली आइक परल । चोल सुटे कुछु नै हुइ, काल्ह सकारे गैरान टोर बुदुसे आछट हेराडेम ।”
मै डरैलक घटनाले सक्कुजे अपन–अपन बात पकरले रहिँट । केउ का कहे, केउ का । मै घरक भित्तर जाइकलाग आपन लुग्गा झराइ लग्लुँ टे पाछे गटियक झब्बामे अट्कल बाँसक झङली भेटैलु । उही छुराइक लाग लिहुरलुँ टे आपन बौनी झुकमुकाइट डेख्लुँ । टब मोर समझमे आ गैल कि ऊ के रहे । मोर गटिया टनुइया ओ पीछा करुइया भुटुवा आउर केउ नै मोरे बौनी (छाँही) ओ बाँसक् झङली रहे । अपन उपर अपनही हँस्टी गटियम अट्कल बाँसक झङ्लीहे एक नजर हेरके अँगनामे बगैलँु ओ मुस्कुरैटी डाईक सँगे भित्तर चल डेलुँ । ओहोर गल्लीम् डशैह्या मन्ड्रक मेरमेरीक खोट बज्टी रहे । मै जुन डाईक् संग भेटैटी कि पठरीम नाक बजाइ लग्लुँ । काने–काने डाईक् आवाज सुन्लुँ–“बाबु री, बाबुऽऽ निंदा गैले ? सुग्घुरसे सुट्, यी लवण्डी यल सुत्ती किल निंदा जाइठ टे का ।”
सिसहनिया–४, दाङदेउखर, हालः नेपालगञ्ज