गोट्यार

गोट्यार

-‘टोर आँखि फुट्गैल रहे रे ! कि जर्जर आँढर होगैल रहिस् ?
अट्राभारि मेंर्वा नाइ डेख्ले, सक्कु ओंइरा बिगार डेहले !’
भुरहान मझ्ला आपन छुट्कि भैवाहे डम्कैटि रहे! छोट्कवा फेन आपन डाडक मुहें–मुहें लरटहे । टब्बहे मैं ठभाकसे ओइने ठन पुग्गैनु! काहे झगरा करटो कैह्के पुछ्नु । डुनुजे आपन बाट सुनैनैं !
बाट रहे, खेटवामें पानि चाँरक लाग् मेंर्वक गर्ठा (गँह्रा) कट्लक ।

यि डाडु भैया कुछ डिन आगे घर फुट्नैं । घर फुट्नासे पहिले अइनके घर स्वर्गसे सुन्डर रहिन । ओइनके चालचलन डेख्के सबजे लल्च्याँइ!
आझ डाडु भैया अप्ने–अप्ने लरट डेख्के महिन ओइनके मिलल घर ओ महिनेहे सम्झैलक बाट याड आइल । घर अल्गैनासे पहिले डाडा भैया महिन खुब सम्झाइँ। –‘हेरि भाइ हम्रे डाडा भैया अट्रा मिलके रहठि कि, हम्रे कबु नाइ घर अल्गैबि, अगर अल्गा फे जाब कहलेसे एकडोसरहे अपन सेकलसम् सघाब, सुख–डुखमें साठ डेहबि, जन्नी टे अस्टे हुइटै, सट्टर घरेक बिटिया नाइ मिल्ठैं, लेकिन हम्रे मिलके रहब, काकरे कि हम्रे टे अक्के खुनके मनैं हुइटि ।’

लेकिन आझ एक्ठो गर्ठक लाग् मारकाट करटैं, टभे कहठैं गोट्यार कबु नाइ हुइसेक्ठैं अपन, गिर्गिट अपन रंग फेरेहस् रंग फेर लेहठैं, बरु परोसि काम लाग जैहिँ, गोट्यार कबु नाइ लग्हिँ, ‘गोट्यार ओ हट्यार’ अक्के हुइटैं !

अंकर अन्जान सहयात्री
जानकी गाउँपालिका-८
जबलपुर कैलाली