घरेक कहानि

घरेक कहानि

-ना टे मैं करु ना टे करत देखट मजा लागठ महिन,
-ना टे मै खाउँ ना टे खाइट डेखट मजा लागठ महिन,
अस्टेक कहटि बहरिमें चाउँर केरैटि भुनभुनैटि रहिन हमार बर्कि भौजि, ओहंर कोन्टिम् से मैं किताब पहर्टि सुन्टि रहुँ हुँकार बाट, उ डिन छोट्कि भौजि अपन लैहरसे अष्टिम्किहा रोटि,सुरिक सिकार, अन्डिक झोर, और नजाने का का चिज रहिन, लैके आइल रहिन, बस् कोन्टिमे अपन गोस्यासे खुब चुप्पे-चुप्पे खाइट रहिन, बर्कि भौजिजुन जने का खोजेगैल रहिन ओ लेहलिन डेख,

ओस्टहंके गैलेक् अठ्वार झबिहान ढेंकिमें बर्कि भौजि गहुँ छाँटे गैल रहिन, उहाँ फे घरेक बारेम्, सास-ससुरुवक् बारेम,अपन बारेम फट्रङ्ग बट्वाइल सुन्लिन्, हमार बर्कि ऐसिन, हमार सास-ससुरुवा वैसिन, नजाने का का फट्रङ्ग बट्वाइल रहिन, यिहे बाट सुनके, यिहे खिढा देखके चाउँर केरैटि बर्बराइट रहिन हमार बर्कि भौजि,

बर्बरैहिन फे का हे नाइ, उ भौजि न टे खोंटिया टिना खाइ जन्ठिन, न टे केक्रो फट्रङ्ग बट्वैठिन, अपन लैहर से लैके आइल सक्कु चिज बाँटबाँट खैठिन, सास-ससुरुवन मजासे हेर्ठिन, भाटपानि डेठिन, पठरि लगाडेठिन, अपन सक्कुचिज साझि कर्ठिन, और छोट्कि भौजिजुन
कोल्काहि कर्ठिन, यहंर ओहंर घरेक फट्रङ्ग बट्वैठिन टे के मजा मन्हिन भला उहिन, यिहे खिढा डेखके बर्कि भौजि डेंहरि फोर डेहलिन,और घर फुटगैनैं,
टभे मैं कठुँ सत्तर घरेक बिटिया, कबु नाइ मिलके बैठके खाइसेक्ठै, एक्ठो सहि टे एक्ठो खराब सब घरमें रहठैं !

अंकर अन्जान सहयात्री

जानकी-८ जबलपुर कैलाली