झुक्का

झुक्का

–छविलाल कोपिला
सावन भादोके महिना । धान कहुँ गाम्हँर रहे, ते कहुँ फुटके बाला झुले । यहोंर डिह्वामे मकै अर्रायल् रहे । जब मकै खैना भर्याली हुइल् । डह्गिक–डह्गिक चिरैं आइलग्लाँ ओ मकै खाके सन्त्वाइलग्लाँ ।
चिरैनके अखवारी करक लग जीउबुझ्ना डिह्वक एक कोनवामे अँटवा बनाइल् । अँटवापरसे हिलाई मिल्न फुच्रहा नम्मा–नम्मा लस्री फेन नमाइल् ओ ओम्हें एक्ठो भैंसिनके बर्का ड्वङडोगियाँ घण्टा फेन झँुराइल् । टन्लेसे लस्रिक फुँच्रा फुरफुरसे करे ओ घण्टा ड्वङ–ड्वङसे बोले ।
जीउबुझ्नक् एक्ठो सयान छाई दुखनियाँ फेन रहिस् । ऊ अँटवापर बैठल् दिनभर गोंरी बिने ओ मकैक रखवारी करे । जब चिरै मकैमे बैठिँट् ते ऊ जोरसे ‘ह्वाह्–ह्वाह्’ कैह्के होह्लाए । होह्लैलोपर नै उरिस् ते ऊ हल्हिल्ले लस्री ताने । लस्रिक फुल्रा फुरफराए ओ घण्टा ड्वङ–ड्वङसे बाले । चिरै झझक्के पूँछ हिलैटी उर्जाइट् ।
डिह्वामे मकै किल नै, झमरामे झलर–मलर खिरा फेन फरल् रहे । दुखनियाँ दिनभर अखवारी करे ओ मकै बँचैले रहे । मुले, रातिक अखवारी केउ नै । रातके गाउँक छुट्टु सुवर मकैमे पैंठिँट् ओ मकै चापर पारके चल्जाइट् । ओहोंर चोर फेन खिरा चोराके लैजाइट् ।
जीउबुझ्ना कैयौं दिन ते सुरिनके लग फाँडा बनाइल्, कुछ दिन पाढी फेन लागल् । मुले, कौनो काम नै लग्लिस् । ऊ सुरिनके खैलक् मकै देख्के चुकचुकाए, मन दुखाए ओ हेरके चल्जाए ।
एक दिन एक्ठो झुक्का बनाइल् ओ डिह्वक् एक कोनवामे लैजाके गारदेहल् । झुक्का पैंरा लट्पटवाके मनैयाँहस् बनैले रहे । लठ्ठी दारके ओकर दुनु हाँठ बनाइल् । छुटी–मुटी डन्ठी दारके घेंचा बनाइल् । गोर ते पैंरके बन्गैलिस् । उहीहे अर्गोइना एक्ठो अर्गोनी फेन खोजल्, बाँसक मुना ।
एक घचिक परसे घेंचामे घ्वापसे फुटल् करुवा घलाइल् । ठिक्के मनैन्के कपारिक ओत्र । करुवक टोंटीक टिस्लोर नाक, तेल्हा कजरले आँख, मूँह ओ कुछ नम्मा–नम्मा मोंछ् फेन बनाइल् । झुक्कक् खुर्कलिया कपारीमे टुटल् छोपा ओर्हादेहल् । एक हाँठ काठक् चकचक्की लगाइल् मुँडार ओ दोसर हाँठ बसौंठा लठ्ठी फेन कक्राइल् ।
ओत्रेकिल नाही, फाटल्–फाटल् उबेनु झुलुवा, खैयर रंगके सुरुवाल ओ उँप्रेसे नम्पुँछिया भेगवा फेन पेह्राइल् । भेगवा हावा लागिस् ते बरेजोर फुरफराइस् ।
झुक्का दूरसे हेरेबेर यल् मनैयाँहस् बिल्गाए । लग्गेसे ठिक्के सोंगियाहस् । जीउबुझ्ना एकबेर गहिँरके हेरल् उहीहे । हाँसी लग्लिस्, हल्का मुस्क्याइल् । सायद आपन बनाइल् ऊ झुक्का सन्तोख लग्लिस ।
झुक्कासे ठोरिक दूर एक्ठो सेम्रा रहे । सेम्रामे सुग्गा, गिद्ध, फेचुङ्घ लगाके आउर चिरै फेन ठाँठ लगैले रहिँट् । सेम्रक एक्ठो डहियामे गुजरिया फेन बसेँरा लेहे । ऊ झोल्पट अँधार हुइस् ते डोन्द्रेमनसे निकरके आपन तेज लजरसे तरे हेरे । तरे मूँस, डुक्री, किरा, फटिङ्गा जौन देखे आपन आहार बनाए ओ पेट भरके आपन ठाँठेम चल्जाए ।
सदादिनिक नन्हेँ आझ फेन गुजरिया कपार निकारके तरे हेरल् । देखल् चम्चर्मौवाँ मुँडार ओ लठ लेले ठर्हियायल् मनैयाँ । ओकर साटो उर्गैलिस् । ऊ मनैयाँ कब जाई ते मैं आहार खोजे जैम् कैह्के बरे घचिक अस्रा हेरल् । मुले, झुक्का ओहाँसे टस्कना बाटे नै रहे । ऊ ओठ्ठेहें रैह्गैल् । गुजरिया निराश हुइटी सन्ध्ये आपन ठाँठेक बैठ्गैल् । आझुक रात अस्टे–तस्टे हुगैलिस्, भुख्ले सुटल् ।
गुजरिया झुक्का देख्के दुस्रा दिन फेन ठाँठेमसे निक्रे नै सेकल् । दिनके आउर चिरैनसे खोत्कवा पाइक् डरे निक्रे नै सेके । रातके झुक्का देख्के ।
जब भूँख पियास सटाइ लग्लिस् ते तिस्रा दिन ऊ हिम्मत कैके बाहेर निकरल् । डराइट्–डराइट् मनैयाँहे लग्गेसे हेरक खोजल् । तब जानल् कि ऊ ते झुक्का हो कैह्के । उहीहे लाज लग्लिस् ओ खुशी फेन । फट्फटैटी झुक्कक् कुम्हाँपर बैठल् ओ सुनाइल् ऊ आपन सक्कु वृतान्त । झुक्का ओकर कहानी सुनके मने–मने हाँसल्, कौनो प्रतिक्रिया नै देहल् । आझ गुजरिया आपन मनका पेट भरल् ओ ठाँठेम् जाके बैठ्गैल् ।
कुछबेरमे पर्चल् सुवर चर्मरैटी डिहवा ओर आइलग्लाँ । झुक्का डराइल्, का चाज आगैल् कैह्के । ऊ झकियाके हेरल् । एक बगाल सुवर आइट् देखल् । मुले, सुवर उहीहे देख्के ठकसे ठर्हिइलाँ । मुँडार ओ लठलेके ठर्हियाल झुक्का देख्के ओइनके हिम्मत नै अइलिन् । हेर्लां–हेर्लां आपन डग्गर लाग्गैलाँ ।
ओसिक ते आझ सन्झा गिडार ओकर पँज्रे आके एक्फाले अवाइलिस् । ऊ साटो जैनामेरके झस्कल् । बरे घचिक ओकर ढकढिउरी ठाउँमे नैआइलिस् । जब उहीहे भत्भेर्टी दौरट् कहँु लग्लाँ । तब ओकर औसान अइलिस ओ बरबराइल् । ‘कोर्ही गिडार, साटो खैनाहस कैठाँ ।’
रात ओकर लग बहुट अन्खोहर लागिस् । चिँगैरन रातभर गीत गाइट् । गीत कुछ चैनार कैलेसे फेन उहीहे चिँगैरनके गीत कन्फोर लग्ठिस् । दख्नक कड्मिक रुखवामे रातभर गह्डुल चेंच्चाइट् । ओइनके चेंचे–मेंमेसे ओकर रातभर नींद नै परिस् । जोग्नीनके प्लिक–प्लिक दीया बारट् भर उहीहे खोब मन पर्ठिस् ।
रात अन्खोर लग्लेसे फेन दिनभर ओकर मजासे बित्ठिस् । जब ओज्रार हुइठ् ते ग्यौंरी मकैक् धानीपर नच्ठाँ ओ ओकर कुम्हाँ, हाँठेपर बैठके गीत फेन सुनैठाँ । गीत खोब सुनठ् । जोग्नी ओकर पँज्रक फूलामे बैठ्के फुर–फुर, फुर–फुर नच्ठाँ । ओइनके नाच देख्के ऊ आउर चौकस हुइठ् । कुटरी ओ परेउनन्के घुटुर–घुटुर घुर्कट फेन खोब मन पर्ठिस् । मुरी हिला–हिला नच्लक नाच अभिन मन पर्ठिस् ।
मुले, झुक्काहे उहीसे ज्यादा दुखनियाँ मन पर्ठिस् । ठिक्केपर गोहर, ठिक्केपर धेङ, ठिक्के पाटिर, ठिक्के ठुल्ह । बत्तिसा लागल् दाँत, हाँसेरबेर पुन्वासी रात लग्ना दुखनियाँहे ऊ खोब हेरठ् । अँटवा चौर्हेबेर, उट्रेबेर ते आउर ज्यादा ख्याल करठ् । का करे कि उट्रे–चौर्हेबेर ओकर नँह्गक आगा फरकके उज्जर–उज्जर जाँघ बिल्गाइस् । ऊ जाँघ देख्के बहुट् रोमान्टिक हुइठ् ।
दुखनियाँ दिनभर आपन तार गोंरी बिने, झुक्का ओकर दिन भरिक काम हेरके चित बुझाए । एक दिन दुखनियँक सखिया गोहियन हहरैटी अँटवक उँप्पर चौर्हलाँ । सक्कु जाने बैठ्के कोई लन्गी, कोइ निमुवाँ निखोरे भिर्लां ते कोई खिरा फँर्चाई लग्लाँ । लन्गीक् वास हर–हरसे झुक्का फेन पाइल् । मुहेम्से थुकथुक्की छुट्लिस् । थूक घुटुर–घुटुर लिलल् । मुले, माँगे नै सेकल् ।
बठिनियन् आउर समय मनमे गुचुर–मुचुर रहल बात बट्वाई नै सेक्ठाँ । मुले जब आपन सखिया गोहियनसंगे बैठहीँ ते खुलके बत्वाइठाँ । आझ सक्कु जाने आपन–आपन मनरख्नन्संगेके प्रेम कहानी पालिक–पाला सुनैलाँ । झुक्का खोब रस लेके सुनल् । बरा रोमान्टिक कहानी । मुले दुखनियाँ आपन कुछ नै सुनाइल् । झुक्का मने–मने सोँचल् ‘सायद हिँकार आपन मनरख्ना कोई नै हुइन् । मैं बाहेक ।’
एक घचिक परसे बैसन बठिनियन, ऊ उहीहे गुड्गुडवइना, ऊ उहीहे । गुडगुड्वइना किल नाही ऊ ओकर, ऊ ओकर झपोसिक–झपोसा फेन करे लग्लाँ । खिटखिट्टी हाँसिक फोहरा छुटल् । अँटवा डगडगा उठल् । यहोंर झुक्का ओइनके सक्कु क्रियाकलाप बहुट रसगरके हेर्टी रहे । ऊ देख्के ठिठ्ठा मारके हाँसल् । मुले ओकर हाँसी कोइ नै सुनल् ।
यहोंर मकैमे एक धंगाल् सुग्गा आके बैठ्लाँ । दुखनियाँ होह्लाइल् ओ लस्री टानल् । लस्रिक् फँुच्रा फुरफुरसे करल् ओ घण्टा ड्वङ–ड्वङसे बोलल् । सुग्गा ‘तैं–तैंं, तैं–तैं’ कैटी चलागैलाँ । सबके ध्यान ओह्रे गैलिन् ओ सक्कु जाने चुपा गैलाँ । एक घचिक परसे उटरके ओइने आपन–आपन घरे ओर लग्लाँ ।
गुजरिया आपन आहार खोजे रोजदिन बाहर निक्रे । पेट भरिस् ते झुक्कक् कन्धापर बैठके देश–परदेश घुम्लक सुनाए । कबो खिसा सुनाए । कबो गाउँ घरके बात सुनाए । खिसा धेरहस् ऊ जलपरी, राजा–रानीनके सुनाए । ओकर बात सुनके झुक्का सम्झठ् ‘अप्ने यहोंर–ओहोंर जाइ नै मिलठ ते का ? सक्कु बात यहें सुने मिलठ् ।’ मन फेन सन्तोख करठ् ।
कबो गुजरिया आपन बुर्हापा जिन्गीक दुखिया कहानी फेन सुनाए । ऊ ध्यान देके सुने । ओ अप्नेहें गुनगुनाए ‘मोर फेन दुःख बा, मैं आपन दुःख किहीहे सुनाउँ, मैं बोल्हीं नै सेक्ठुँ । मोर दुःख के बुझी ?’
कबो–कबो झुक्कापर एक्ठो फेचुङ्घ बैठे आए । बरा फट्फुहर रहे फेचुङ्घ । कबो ओकर कपारीमे पिचसे हेग्दिस् । कबो हाँठेम् ते कबो झुलुवामे । आझ फेन ओकर कपारीमे बैठ्के आपन आहार चिटाइटा । ओहोंर बेन्हवाँमे कुक्लेंरवा ‘कुक्लेंर–कुक्लेंर’ कैह्के बोले । ओकर बोल सुनके झुक्का मने–मने ‘छिः अइसिन घिनाहुन बोल्टा ।’ कैह्के बरबराइल् ।
यहोंर फेचुङ्घ पिचसे ओकर कपारिक हेग्देलिस् । गुह् डनियाके ओकर मूँहसम्म आपुग्लिस् । ‘उःहु’ कटी मूँह बाँक कैल् । ओ बरबराइल् । ‘यी कोर्हिया करिकवा, जहाँ पाई ओहैं पिच–पिच लगैले रहठ् ।’
सायद, यी सब देख्के मकैम् फुद्रुक–फुद्रुक उलर्टी रहल् फुडिया ‘ठीक–ठीक’ कैह्के उहीहे टिहुवइटी रहे । झुक्काहे आउर रीस लग्लिस् । ‘सारन कस मुना लगादेम्, ठौंही झम्¥या जैबो ।’ बरबराल् अप्ने–अप्ने । मुले, ओकर ठन लठ्ठी उठैना बल नै रहिस् । ऊ गुनगुनाइल् किल् ।
आझ दुखनियाँ अखोरी नै आइल् । उहीहे नै देख्के झुक्काहे सुनसान लग्लिस् । ऊ बरे घचिक अश्रा हेरल् टब्बो नै अइलिस् । कुछबेरमे एक बगाल् सुग्गा आके मकैमे बैठ्लाँ ओ मकैक् चोंइटा निखोरके किम्होंरे लग्लाँ । झुक्का ओइनहे देख्के हट्पटाइल् । मने–मने खोब होह्लाइल् फेन । मुले, ओकर बोल् सुग्गा सुन्लाँ कि नै ऊ पट्टे नै पाइल् ।
एक घचिक परसे मकैमे चर्मरैटी दुई–तीनठो लर्का अइलाँ । ओइने ओक्रे आगे खिरा टुरे लग्लाँ । खिरा चोराइट् देख्के ढेबर लप्लप्वइटी बोलल् । ‘अरे ! कोर्हियौ, का आनक खिरा चोराइटो रे । तुहिनके बाबक कमाही हो, आपन मनका टुरा टो ?’ ओइने ओकर बोले नै सुन्लाँ । उल्टे कोइ, उहीहे लटियाके गैलाँ ते कोई मुक्का मारके । ऊ हटल् गिद्धहस् हेरके रैह्गैल् । कुछ नै उँखारे सेकल् ।
दोसर दिन दुखनियाँ ठनिक ज्यादा सँपरके आइल् । झुक्का उहीहे जिन्गीमे पहिल बार अइसिके सँपरके आइल् देख्ले रहे । ओसिक ते ऊ बिना सँपरल् जोन्हियाँहस् सुग्घुर रहे । सँप्रलमे ते आउर ऊ ठिक्के अप्सरा हस् ।
ऊ अइटी किल खर्खरैले उँप्पर चौर्हल् हाँठेम् मोत्री लेले । ओकर पाछे–पाछे एक्ठो लवन्डा मनैयाँ फेन चौर्हट् देखल् झुक्का । कब्बो नै देखल् लवन्डा, उहीहे भ्रममे परलहस लग्लिस् । मुरी झित्कारके ठनिक गहिँरके हेरल् । दुखनियाँ ओकर हाँठ पकरहे उँप्पर टन्टी रहे । ऊ लवन्डा देख्के ओकर मन जूर हुगैलिस् ।
हेर्टी–हेर्टी दुनु जाने एक दोसरहे आपन दुठाहा खवाइक–खवावा करेलग्लाँ । कबो ऊ ओकर गाल, ते कबो ऊ ओकर गाल चुमिक–चुमा करट् ऊ आपन आँखिक आँख देखल् । असिन ऊ जिन्गीमे कब्बो नै देख्ले रहे । जब लवन्डक हाँठ ओकर बक्षस्थलसम पुग्लिस् ते ओकर अंग सिरिङसे कैलिस् । उहीहे अप्नेहें लाज लग्लिस् । टब्बो ऊ हेरल् मसोरा–मसोर, आउर …..।
ऊ सम्झल् टप्की बठिनियनके सुनाइल प्रेम कहानी । आझ दुखनियँक असली कहानी फेन देखल् । जिहीहे ऊ आपन सम्झले रहे । उहीहे आपन आँखिक साम्ने असिन देख्के ऊ टपसे आँस चुहाइल् । सुनुक–सुनुक कैटी सुस्करल् फेन ।
रात हुइल् । सदा दिनिक नन्हें चिंगैरनके चिंचिं सुनके कपार फुटेहस् लग्लिस् । जोग्नीनके प्लिक–प्लिक फेन मन नै पर्लिस् आझ । मनमर्ले झोँक्रल् रहे । एक बगाल सुवर घुई–घुई कैटी मकैहा डिहवा ओर आइलग्लाँ । सुवर आझ झुक्कक् कौनो वास्ता नै कैलाँ । अइटी कि मकै च¥याक–म¥याक कैटी चर्हे लग्लाँ । झुक्का फेन कौनो प्रतिक्रिया नै देहल् । मने–मने बरबराइल् ‘खाऊ, जठेक सेक्बो ते खाऊ, यी मकै तुहिनके फेन ते हो ।’
सायद, आझुक दिन झुक्कक् बहुट बेखुसमे बित्लिस् । ऊ बहुट निरास रहे । झोल्पट् अँधार हुइल् । गुजरिया तरे उट्रल् । झुक्काहे बहुट निरास देखल् । आपन संघरिया निरास देख्के ऊ पुँछल् । झुक्का सक्कु आपन वृतान्त सुनाइल् ।
आखिर झुक्कक बात सुनुइया के रहिस् । उहे एक्ठो गुजरिया किल् ते । कौनो दिन झुक्कक कारणसे तीन दिनसम भुख्ले मुलेसे फेन अस्कल सबसे लग्गेक् संघरिया उहे झुक्का हो । गुजरिया कौनो दिन बेखुस मन रहल समय आपन विटल् दिनके कहानी सुनाए ।
आझ आपन संघरियक् दुःखमे मन चौंकस कराइक लग आपन प्रेम कहानी सुनाइल् । वास्तविक कहानी, बहुट रोमान्टिक कहानी । ओकर कहानी सुनके झुक्का आउर बात सब बिस्राके मन खुस हुगैलिस् । गुजरियइहे झुक्का चौंकस् देख्के ओक्रो मन चौकस् लग्लिस् । ऊ कन्धापर फट्फटाइ ओ उरके आपन ठाँठेम् चल्गैल् ।
बिहान हुइल् । दुखनियाँ फेन आपन गोंरी बिन्न, पूँजा, कसुङ्गा ओ अच्करे गोंरी लेके अँटवापर चौर्हल् । सदादिन देख्के मन लल्चैना दुखनियाँ । झुक्का आझ उहीहे ओत्र सुग्घर नै देखल् । सोझ लजरसे फेन नै हेरल्, घुँरेर–घुँरेर हेरल् । आउर दिनिक नन्हें ओत्र वास्ता फेन नै कैल् ।
समय बिटट् गैल् । मकै पाकल् । जीउबुझ्ना डिह्वक सक्कु मकै टुरल् । डिह्वा मैदान हुगैल् । डह्गिक–डह्गिक अइना चिरै फेन आइक छोरदेलाँ । ग्यौंरी, फेचुङ्घ, कुक्लेंरवा, फुडिया फेन नै आइ लागल् । उहीहे आउर सुनसान लागे लग्लिस् । रातके गुजरिया खिसा सुनाके साथ दिस् ओ रात मजासे बिटाए । मुले, दिन हुइटी कि बैराग लागिस् ।
एक दिन भारी आँधी वयाल आइल् । झुक्का लग–लग, थर–थर करल् । अक्के घचिमे ओकर कपारीमे ओर्हैलक् छोपा उराके लैगैलिस् । हेर्टी–हेर्टी कपार उजारके भुइयामे ठच्कोसे फोरदेलिस् । ऊ बिना कपारिक हुगैल् । टब्बोपर वयालसे प्रतिकार करक लग कैयौं चो मुँडार फनफनवाँइल्, हाँठक् लठ फेन हप्लाइल् मुले कुछ करे नै सेकल् ।
कुछबेर मुँडार ओ लठ फेन अँछोरके बगा देलिस् वयाल् । उहीहे भुइयाँमे घुँचेट्लिस् । कैयौं गँरबिल्टी खेला देखिस् । बिचारा ! झुक्का ठौंही घुस्मुरल् रैह्गैल् । ओकर ओंहे मौत हुगैलिस । मौत पाछे गुुजरिया फेन अक्केली हुगैल् । अक्केली बैठ्नास नै लाग्के ऊ फन यी दुनियाँ छोरके छुट्टे दुनियाँमे चल्गैल् ।

बुख्याँचा, दुखनियाँ र लाटोकोसेरो
–छविलाल कोपिला
साउन–भदौको महिना । कतै धान पसाउँदै थियो, कतै बाला झुल्दै थियो । यता मकैबारीमा मकै दाना लाग्दैथ्यो । जब मकै खान लायक भयो । बगालका बगाल चराहरु आउन थाले र मकै खाएर सताउन थाले ।
चराहरुको रखवारी गर्नका लागि जीउबुझ्ना बारीको एक कुनामा एउटा अँटवा बनाएको छ । अँटवा माथि बसेर हल्लाउन मिल्ने झुप्पेदार डोरी पनि लगाएको छ र डोरीमा एउटा भैंसी–घण्टा पनि झुण्ड्याएको छ । डोरी तान्दा डोरीमा लगाएका झुप्पाहरु फुरफुर–फुरफुर हल्लिन्छ भने घण्टा पनि ड्वङ–ड्वङ, ड्वङ–ड्वङ बज्छ ।
जीउबुझ्नाको एउटी जवान छोरी दुखनियाँ पनि छे । ऊ अँटवामाथि बसेर दिनभरि गोंरी बुन्ने र मकैको रखवारी गर्ने गर्छ । जब चराहरु मकैमा बस्छन् तब ऊ जोर–जोरले ‘ह्वाह्–ह्वाह्’ भनेर चिच्याउँछ । चिच्याउँदा पनि नभागेपछि ऊ हत्तपत्त डोरी तान्छ । डोरीको झुप्पा फुरफराउने र घण्टा ‘ड्वङ–ड्वङ’ आवाजले चराहरु तर्सिएर पुच्छर हल्लाउँदै उड्छन् ।
बारीमा मकै मात्र होेइन, झाङमा काँक्राहरु पनि लतरम्मै फलेका छन् । यसरी दुखनियाँ दिनभरि रखवारी गरेर मकै बचाएकी छे । तर, रातिको रखवारी कोही थिएन । राति गाउँका छाडा सुंगुरहरु मकैबारीमा पस्थे र मकै सोत्तर पारेर जान्थे । यता चोर पनि काँक्रा चोरेर लैजान्थे ।
जिउबुझ्ना कैयौं दिन त सुंगुरका लागि पासो पनि थाप्यो । चोर समात्न राति बारीमै लुकेर–ढुकेर बस्योे । तर, न पासोमा सुंगुर फँसे, न उसले चोर भेट्टाउन सक्यो । ऊ सुंगुरहरुले खाएको मकै देखेर मन दुखाउँथ्यो र नोक्सानी हेरेर चिन्ता मुद्रामा घर फर्किन्थ्यो ।
एक दिन एउटा उपाय निकाल्यो । बुख्याँचा बनायो र बारीको एक कुनामा लगेर ठड्यायो । बुख्याँचा पराल बेरेर मान्छे जस्तै बनाएको थियो । एउटा लठ्ठी हालेर उसको दुबै हात बनायो । सानो काठ हालेर घाँटी बनायो । खुट्टा भने उही परालकै बनिहाल्यो । उसलाई अड्याउने एउटा बाँसको किलो खोजेर पनि ठड्यायो ।
एक छिनपछि घाँटी बनाएको काठको किलामा फुटेको करुवा राख्यो । ठ्याक्कै मान्छेको टाउको जत्रो । करुवाको टँुटी लाम्चो नाक, तेलमा फिटेको कालो खरानीको आँखा र खरानीकै लामो–लामो जुँगा पनि बनायो । बुख्याँचाको टक्लु टाउकोमा टुटेको छोपा (छत्री) लगाइदियो । एक हातमा काठको चम्किने कागज बेरेको खुकुरी र अर्को हातमा बाँसको लौरो समाइदियो ।
त्यसैगरि, उसले फाटेको कमिज, खैरो रंगको सुरुवाल र लामपुच्छे भेगवा (लगौटी) पनि लगाइदियो । भेगवा हावा चल्दा जोर–जोरसंग हल्लिन्थ्यो ।
बुख्याँचा टाढाबाट हेर्दा ठ्याक्कै मान्छे जस्तै देखिन्थ्यो, नजिकबाट जोकर जस्तै । बुख्याँचा बनेपछि जिउबुझ्ना एकफेर गहिरिर हे¥योे । हाँसो लाग्यो र हल्का मुस्कुरायो एक्लै । सायद आफूले बनाएको बुख्याँचा सन्तोष लाग्यो उसलाई ।
बुख्याँचाभन्दा अलिकति टाढा एउटा सीमलको रुख थियो । सीमलमा सुगा, गिद्ध, फेचुहा लगायतका अरु चराहरु पनि थिए । सीमलको पश्चिमपट्टिको हाँगोमा एउटा लाटोकोसेरोे पनि बस्थ्यो । ऊ साँझ परेपछि आफ्नो गुँडबाट निस्केर अँध्यारोमा नजरले तल हेथ्र्यो । तल मुसा, किरा, फट्याङ्ग्रा जे देख्थ्यो त्यही आफ्नो आहार बनाउँथ्यो र पेट भरेर आफ्नो गुँडमा गएर सुत्थ्यो ।
सदाझैं आज पनि लाटोकोसेरोे टाउको निकालेर तल हे¥योे । ऊ एकाएक झस्कियो । देख्यो चम्किरहेको खुकुरी र बाँसको लौरो लिएर उभिएको अजंगको मान्छे । अजंगको मान्छे देखेर उसको साटो उड्यो । ऊ थरथर काप्दै धेरै बेरसम्म उसलाई हे¥योे । तर, बुख्याँचा त्यहाँबाट टस्किने (जाने) कुरै थिएन । लाटोकोसेरोे निराश भएर चुपचाप आफ्नै गुँडमा गएर बस्योे । आजको रात यसैगरी बित्यो । ऊ भोकै सुत्यो ।
बुख्याँचा देखेर अर्को दिन पनि गुँडबाट बाहिर आउन सकेन लाटोकोसेरोे । दिउँसो अरु चराहरुले लखेट्ने, थुङ्ने डरले बाहिर निस्किन सक्दैनथ्यो । राति बुख्याँचा देखेर ।
जब तेस्रो दिन भयो, भोकले खपिनसक्नु भएपछि ऊ हिम्मत गरेर बाहिर निस्क्यो । भोकले आजीत भएको थियो तर पनि डराउँदै–डराउँदै मान्छे भनिएको बुख्याँचालाई नजिकबाट हेर्न खोज्यो । बुख्याँचा उभिएको देख्यो । उसलाई लाज लाग्यो र खुशी पनि । खुशीले आफ्नो तीन दिनको भोक पनि बिस्र्योे । ऊ फट्फाउँदै बुख्याँचाको कुम माथि बस्योे र सुनायो आफ्नो सबै वृतान्त । बुख्याँचा उसको कहानी सुनेर मन–मनै हाँस्योे, तर कुनैै प्रतिक्रिया दिएन । आज लाटोकोसेरोे धीतमरुन्जेल पेट पनि भ¥यो र आफ्नै गुँडमा गएर बस्योे ।
केहीबेरमा, सँधै पल्केका सुंगुरहरु मकैका डाँठ भाँच्दै आउन थाले । बुख्याँचा झस्कियो, के आयो भनेर । ऊ नियालेर हे¥योे । एक बगाल सुंगुरहरु आएको देख्यो । ऊ तिरै आइरहेका सुंगुरहरु उसलाई देखेपछि टक्क रोकिए । हातमा खुकुरी र बाँसको लौरो लिएर कुनैै मान्छे उभिएको देखेर उनीहरुको पनि हिम्मत आएन । केहीबेरसम्म उसलाई हेरे र आ–आफ्नो बाटो लागे । मकै खान पाएनन् ।
त्यसो त आज साँझ स्यालहरु पनि उसकै छेउमा आएर कराए । एकाएक स्याल कराएपछि ऊ साटो जाला झैं झस्कियो । धेरैबेरसम्म उसको मुटु ढुकढुक गरिरह्यो । जब उसंग ठोक्किदै कतै दौडिए तब उसको ख्याल आयो र बरबरायो । ‘थुक्क ! साला स्यालहरु, साटो खाउलान् झैं गर्छन् ।’
उसलाई रात रमाइलो लाग्दैन । झ्याउँकिरीहरु रातभरि गीत गाउँछन् । उसलाई झ्याउँकिरीको गीत मन पर्दैन । दक्षिणपट्टीको कदमको रुखमा चमेराहरु ‘चेंचे–मेंमे’ गर्दन् । ‘चेंचे–मेंमे’ले उसको रातभरि निद्र पनि पर्दैन । जुनकिरीहरु ‘प्लिक–प्लिक’ दीयो बालेको भने उसलाई खूब मन पर्छ ।
रात नरमाइलो भएपनि दिन भने उसलाई बितेको पत्तै हुँदैन । जब बिहान हुन्छ । भँगेराहरु मकैको धानामा बसेर नाच्छन्, उसको कुममा बसेर गीत गाउँछन् । गीत खूब सुन्छ ऊ । पुतलीहरु फूल–फूलमाथि, पात–पातमाथि फुर–फुर, फुर–फुर नाच्छन् । उनीहरुको नाच देखेर ऊ बहुत रमाउँछ । ढुक्कुर र परेवा घुटुर–घुटुर घुर्केको पनि उसलाई खुब मनपर्छ । टाउको हल्लाई, हल्लाई नाचेको अझ मनपर्छ ।
तर, बुखँचालाई यी कुरा भन्दा बढी दुखनियाँ मनपर्छ । ठिक्कको गोरी, ठिक्कको उचाई, जीउडाल मिलेको पूर्णिमाको रात झल्किने दुखनियाँलाई ऊ खूब हेर्छ । अँट्वा चढ्नेबेला अनि झर्नेबेला ऊ अझ बढी ख्याल गर्छ । किनकि चढ्ने–झर्नेबेला उसले लगाएको नेँह्गाका आगा फर्किएर गोरो साप्रा देखिन्छ । ऊ त्यही साप्रा देखेर बहुत रोमान्टिक हुन्छ ।
दुखनियाँ दिनभरि आफ्नै धुनमा गोंरी बुनिराख्छे, बुख्याँचा उसको दिनभरिको काम हेरेर चित्त बुझाउँछ । एक दिन दुखनियाँको सखी–संगीहरु हाँस्दै अँट्वा माथि चढे । सबै जना बसेर ज्यामूर, निबुवा, काँक्रा खान थाले । ज्यामूरको बास्न बुख्याँचासम्म आइपुग्यो । अमिलो ज्यामूरको बास्नले उसको मुखमा पानी आयो । मागूँ–मागूँ लाग्यो । ऊ घुटु–घुटु थूक निल्यो तर माग्न भने सकेन ।
केटीहरु अरुबेला मनभित्र उम्सिएको कुरा बताउन चाहँदैनन् । तर, आफ्ना साथी–संगीहरुसंग भने खुलेरै कुरा गर्छन । आज त्यहाँ जम्मा भएकाहरुले पनि खुलेरै गफ गरे । प्रायः आ–आफ्ना प्रेमकहानी सुनाए उनीहरु । यता बुख्याँचा निकै ध्यान पूर्वक सुनिरह्यो । निकै रोमान्टिक कहानीहरु । तर, दुखनियाँले आफ्नो कहानी सुनाउन भ्याइन । बुख्याँचा मन–मनै सोँच्यो ‘सायद उनको आफ्नो प्रेमी कोही छैन होेला, म बाहेक ।’
एकछिन पछि केटीहरु, एकार्कालाई काउकुटी लगाएर छिल्लिन थाले । काउकुटी मात्रै होेइन एकार्काको समाता–समात पनि गर्न थाले । जसले गर्दा उनीहरु बीच हाँसो फोहरा उठ्यो । अँटवा डगमगायो । यता बुख्याँचा उनीहरुको सबै क्रियाकलाप हेर्दै थियो । निकै रोमान्टिक थियो । त्यो सबै देखेर बेस्गरी हाँस्योे तर उसको हाँसो कसैले सुनेन् ।
यता मकैमा एक हूल सुगाहरु आएर बसे । दुखनियाँ चिच्याउँदै डोरी तानी । डोरीमा लगाइको झुप्पा फुरफर ग¥योे र घण्टा ‘ड्वङ–ड्वङ, ड्वङ–ड्वङ’ बोल्यो । सुगाहरु ‘तैं–तैंं, तैं–तैं’ गर्दै त्यहाँबाट भागे । सबैको ध्यान उतै तानियो र सबै चुप लागे । एकपछिन पछि सबै आ–आफ्नो घरतिर लागे ।
लाटोकोसेरोे आफ्नो आहार खोज्न हरेक दिन बाहिर निस्कन्थ्यो । पेट भरेपछि बुख्याँचाको कुम माथि बसेर देश–परदेश घुमेको कथा सुनाउँथ्यो । कथा सुनाउँदा धेरैजसो जलपरी, राजा–रानीको कथा सुनाउँथ्यो । यसैगरि कहिले हँस्यौली–चुट्किला, कहिले गाउँखाने कथा, कहिले त गाउँघरमा भएको गतिविधिहरु पनि सुनाउँथ्यो । देश दुनियाँको कुरा सुनेर बुख्याँचा सम्झिन्थ्यो । ‘आफूलाई यता–उता जान नपाएर के भो ? सबै यही सुन्न पाइहालिन्छ ।’ ऊ मन सन्तोषको साँस फेर्छ ।
कहिले लाटोकोसेरोले आफ्नो बुढेशकालको दुखिया कहानी पनि सुनाउँथ्यो । ऊ ध्यान दिएर सुन्थ्यो र आफै गुनगुनाउँथ्यो । ‘मेरो पनि दुःख छ, म आफ्नो दुःख कसलाई सुनाउँ, म बोल्नै सेक्दैन । मेरो दुःख कसले बुझ्ने ?’
कहिलेकाहीं बुख्याँचामाथि एउटा फेचुहा बस्न आउँथ्यो । ऊ बहुत फोहोेरी थियो । कहिले उसको टाउकोमा दिसा गरिदिन्थ्यो । कहिले हातमा त कहिले उसको कपडामा । आज पनि उसको टाउको माथि बसेर आहारा खोजिरहेको छ । उता बारको एउटा किलोमा बसेर कुक्लेंरवा चरो ‘कुक्लेंर–कुक्लेंर’ बोल्यो । ऊ बोलेको सुनेर बुख्याँचा मन–मनै ‘छिः यस्तो फोहोेर बोलिरा’छ ।’ भनेर बरबरायो ।
ठीक यसै समय फेचुहा चरा उसको टाउकोमा दिसा गरिदियो । दिसा बगर उसको मुखसम्म आइपुग्यो । ‘उःहु’ भन्दै मुख बटा¥योे र बरबरायो । ‘योे बेबकुफ काले, जहाँ पाउँछ, त्यहीं दिसा गरेर हैरान बनाउँछ ।’
सायद, योे सबै देखेर मकैमा फुद्रुक–फुद्रुक उफ्रिदै फिस्टे चरा ‘ठीक–ठीक’ भनेर उसलाई खिसी गरिरहेको थियो । बुख्याँचालाई झन रीस उठ्यो । ‘साला यही लठ्ठोले हान्छु, अनि त्यही मर्छस् ।’ बरबरायो आफै । तर, ऊ संग लठ्ठी उठाउन सक्ने सामथ्र्य थिएन । मन–मनै गुनगुनायो मात्रै ।
आज दुखनियाँ अखोरी गर्न आइन । उसलाई नदेखेर बुख्याँचालाई सुनसान लाग्यो । ऊ धेरै बेरसम्म प्रतीक्षा ग¥योे । तर आइन । केहीबेरमा एक हूल सुगाहरु आएर मकैमा बसे र मकै खाना थाले । बुख्याँचा उनीहरुलाई देखेर आत्तियो । मन–मनै खूब चिच्यायो तर, ऊ चिच्याएको सुगाहरु सुने या सुनेनन् पत्तै पाएन ।
एकछिन पछि मकै बारीमा दुई जना केटाहरु आए । उनीहरु पनि उसकै अगाडि फलेको काँक्रो टिप्न थाले । काँक्रो चोरेको देखेर आत्तिदै बोल्यो । ‘ओई ! फटाहाहरु, किन अरुको काँक्रो चोरेको ? । तिमीहरुको बाउको कमाई होे ? आफू खुशी काँक्रा टिपेका छौं ?’ उनीहरुले उसको आवाजै सुनेनन् । उल्टै एउटाले उसलाई लात लगायो र अर्कोले मुक्का हान्यो । ऊ हारेको गिद्ध जस्तै हेरी मात्र रह्यो । केही गर्न सकेन ।
अर्को दिन दुखनियाँ अलि बढी सिंगार पतार गरेर आई । बुख्याँचा उसलाई जिन्दगीमा पहिलो पटक यसरी श्रृंगार गरेको देखेको थियो । त्यसो त ऊ बिना श्रृंगार पनि राम्री थिई । सबै श्रृंगारमा सजिएपछि त झन ऊ ठ्याक्कै अप्सरा जस्तै देखिएकी थिई ।
ऊ आउने बित्तिकै सदा जस्तै फटाफट अँट्वामा चढी । उनको पछि–पछि अर्को एक जवान ठिटो पनि चढ्यो । यसभन्दा पहिले बुख्याँचाले उसलाई कहिले पनि देखेको थिएन । उसलाई भ्रममा परेजस्तो लाग्यो । टाउको झत्कारेर गहिरिएर हे¥योे । साँच्चिकै जस्तो लाग्यो । दुखनियाँ उसको हात समातेर माथि तान्दै थिई । त्यो सब दृष्य देखेर बुख्याँचाको मन चिसो भयो ।
एकछिन पछि दुबै खाजा खाना थाले, उनी एकार्काका जुठो खाना र खुवाउन थाले कहिलेकाहीं त मोइ पनि खान्थे दुबै । योे सब ऊ आफ्नो आँखा अगाडि देख्यो । यस्तो ऊ जिन्दगीमा कहिले देखेको थिएन । जब ठिटो आफ्नो हात दुखनियाँको बक्षस्थलसम्म पु¥योे । उसको आंग सिरिङ ग¥योे । उसलाई आफै लाज लागेर आयो । ठिटो मसोरा–मसोर गर्न थाल्यो, अरु के के पनि …..।
ऊ सम्झियो, अस्ति सुनेका प्रेमकहानीहरु । आज आफ्नै आँखा अगाडि दुखनियाँको असली कहानी देख्यो । जसलाई ऊ आफ्नो सम्झेको थियो, उसैलाई आफ्नो आँखा अगाडि यस्तो देखेपछि उसको आँखाबाट टप्प आँशु झ¥योे । भित्र–भित्रै रोयोे पनि ।
साँझ परेपछि झ्याउँकिरीहरु कराउन थाले । उनीहरुको आवाज सुनेर उसको टाउको फुट्ला झै लाग्यो, जुनकिरीको प्लिक–प्लिक पनि मन परेन ।
निराश भएर बसिरहेको थियो । एक हूल सुंगुर ‘घुई–घुई’ गर्दै मकैबारीमा आउन थाले । सुंगुर आज बुख्याँचाको कुनैै वास्ता गरेनन् । बारीमा मकै ‘च¥याक–म¥याक’ खान थाले । बुख्याँचा कुनैै प्रतिक्रिया दिएन । मन–मनै बरबरायो ‘खाऊ, जत्ति सक्छौ खाऊ, योे मकै तिमीहरुको पनि होे ।’
सायद, आजको दिन बुख्याँचाको बेखुसमा बित्यो । ऊ बहुत निराश थियो ।
अँध्यारो भयो । लाटोकोसेरो तल झ¥योे । बुख्याँचालाई निराश देख्यो । आफ्नै साथी निराश देखेपछि जिज्ञासा राख्यो । बुख्याँचा सबै आफ्नो वृतान्त सुनायो ।
आखिर बुख्याँचाको कुरा सुनिदिने को थियो र ? उही लाटोकोसेरोे मात्रै त होे । कुनैै समय बुख्याँचालाई देखेर तीन दिनसम्म भोकै विताएपनि आजकल सबैभन्दा नजिकको साथी बुख्याँचा भएको छ लाटोकोसेरोको ।
लाटोकोसेरो कुनैै दिन बेखुस हुँदा आफ्नो बितेका दिनहरुका कहानी सुनाउँथ्यो । आज आफ्नो साथीको दुःखमा साथ दिन भनौ या उसलाई खुशी देख्न आफ्नो प्रेमकहानी सुनाउन थाल्यो । उसको आफ्नो वास्तविक कहानी, बहुत रोमान्टिक कहानी । उसको कहानी सुनेर बुख्याँचा सबै दुःख बिर्सिएर खुशी देखियो । बुख्याँचा खुशी देखेर लाटोकोसेरो पनि खुशी भयो । ऊ केहीबेर बुख्याँचाको कुममाथि फट्फटायो र बिदा लिएर आफ्नो गुँडमा गएर बस्योे ।
बिहान भयो । दुखनियाँ पनि आफ्नो गोंरी बुन्ने, पूँजा, कसुङ्गा र अधुरो गोंरी बोकर आई र अँटवामाथि चढी । देख्दै मन लोभ्याउने दुखनियाँ, बुख्याँचा आज उसलाई खासै राम्री देखेन । सोझो नजरले हेर्न पनि हेरेन । न त कुनैै वास्ता ग¥योे ।
समय बित्दै गयो । मकै पाक्यो । जिउबुझ्ना बारीको मकै पनि घरभित्र भित्रायो । मकै भित्राएपछि दुखनियाँ पनि आउन छोडिन् । मकै बारी पुरै उजाड भयो । हूलका हूल आउने चराहरु पनि आउन छाडे । भँगेरा, फेचुहा, कुक्लेंरवा, फिस्टे पनि आउन छाडे । उसलाई अझ सुनसान लाग्यो । राति लाटोकोसेरो कथा सुनाएर साथ दिन्थ्यो र रात मजाले बित्थ्यो । तर, बिहान हुँदा उराठ लाग्थ्यो ।
एक दिन ठूलै हुरी–बतास चल्यो । बुख्याँचा लग–लग, थर–थर ग¥योे । एकछिनमा उसले लगाएको छोपा (छत्री) उडायो । हेर्दा–हेर्दै उसको टाउको उखेलेर भुईमा ठ्याच्च फुटाली दियो । ऊ बिना टाउकोको भयो । तैपनि हुरीसंग प्रतिकार गर्न कैयौं पटक खुकुरी नचायो र लौरोमा पनि फन्नायो तर केही गर्न सकेन । केहीबेरमा हातको खुकुरी र लौरो पनि खोस्योे हावाले र उसलाई त्यही लडायो । बुख्याँचाको अवशान भयो । अवशान पछि लाटोकोसेरो पनि एक्लो भयो । केही दिन पछि ऊ पनि बसाई सारेर अर्को दुनियाँमा पुग्यो ।