राजअहिरिया

राजअहिरिया

मोहनलाल चौधरी
अघट्य कौनो एकठो डेशम राजा रल्ह । उ राजाके अनधन् श्री सम्पत्ति,हाँथीघोडा,लाउलस्कर,गैयाभैंसीनियाँ,छेग्रभेडी,जग्गा जिमिन सब पुगल रल्हिन । सन्तानके हिसाबम चारठो छावा रल्हिन । सम्पूर्ण चिजबस्तु परिपूर्ण हुईलकआर्से राजा अमनचयनतके साथ जिवनयापन करतरलह । चारथो छावा मढ्येबर्का छावक् नाउँ राजअहिरिया रहिन् । उ राजकुमार शिकार खेल्नाम बरा सौकिन रहिट । क्रमशः दिन बितती गैल । एकदिन उ राजक्मार बन्वाँम सिकार खेल जैना बिचार कर्ल । सिकार खेले जाइबेर कडाचिट मै मर हर जैम ट इ चिन्हाँ छोरके जाइटु कैह्क जिवनके चिन्ंहाँ पिपरा,बरगद,आम अमली लगाक जिवनके सहिदान धैक घोर्वाम सवार हुईथ ओ एकथो गित गैथ ।
गित
वायु बहल बहपुरवैया रे, बहपुरवैया ।
अहिरिया आवैं ना घरे , ।।१।।
चल्ते चल्ते कजरीक बन्वाँम पुग्थ, वहाँसे फेन आग बढके बैंरिक बन्वाँम पुग्थ,बैंरिक बन्वाँकेबादम और और बन्वाँ नघती हैंसके बन्वाँम पुग्थ,ओकरबादम एकदम घना छिर नैसेक्ना बिजा बनखन्म पुग्जैथ । बिजा बनखनम पुग्नकबादम जब शिकारके लाग कौनो फेन चित्तर तथा और जिन्वाँर नैमिल्थ ओ बन्वाँ फेन एकदम घनके मार छिर नैसेक्नाके कारण खिसियाक घोर्वाहन चन्दनके रुखुवाम बाँध्क अप्न चाहीं चन्दनके रुखुवाम चिहुरजैथ । जब बनुवाँ चरपतहीं जरलागथ ओ बन्वाँके जिन्वाँर, पंक्षीलोग भाग लग्थ और सब भाग भाग जैथ तर चिमता चाहीं हली भाग नै सेक्के ओस्त मुअ लग्थ त राजअहिरीयाहन दया अईथिन ओ बहुत गहिंरक सोंच्थकी हे भगवान बाघ,भालु,चित्तर,हाँथी,चिरैंचुरुड०गा,पाखपखीउरी त उरक भाग जैही तर चिम्ता त कहाँ भाग सेकहीं, मै बहुत बेकार काम करनु कैक पश्चाताप करथ और उप्पर रुखुवामनसे गित गैथँ 
गित
पाख पखीउरी सब उरी जैहीं रे,
चिमतीके परल बरी दुःख हो मारी राजा ,
अहिरिया आवैं ना घरे ।।२।।
अत्रा सोंच्क गित गाक तर भुईयाँम हेर्थ त और ठाउँ जरक सब सफा होजाइइथ पर एकथो छोटीमोटी ठाउँ नै जरथ त राजअहिरिया बहुत अचम्म पर्थ और सोंच्थ की आगी लगाईल्म अन्त सब जरजैना पर उ ठाउँ नै जरना का कारन हो कैक रुखुवामनसे उतरके हेर जैथ तौ एकथो तपस्वी रथी । राजअहिरिया ओहाँ जाक तपस्वीसे पुछ्थ की  
गित
का तैं हुईत्या दुत भूत रे, का तैं हुईत्या जोगीनकै पुत,
बिच जंगलमे लोदना पसारी हो,मोरी राजा अहिरिया आवैं ना घरे ।।३।।
अत्रा गित गाक तपस्वीहन राजअहिरिया कहल की तैं के हुईस । अतना घना बनुवाँ ओहीम बाघ, भाल, हाँथी,ब्वाँसा जस्सीन हिंस्रक जिन्वाँर रहल ठाउँ आपन जिउ ज्यानके परवाह नै राख्क अकेली इ घोर घना बनुवाँम का कारणसे तैं घोर तपस्या करत्या । का त्वार दुःख परल बात,कहत घरीम तपस्वी जन्नी कली की
गित
ना मै हुईतुँ दुत भूत रे,ना मै हुईतुँ जोगीनकै पुत,
एक पुता बिना मै बरी दुःखीके कारण बिच जंगलमे लोडना पसारी हो मोरी राजा,
अहिरिया आवैं ना घरे ।।४।।
अत्रा कहिक तपस्वी कहथ की अम्हिन मोर तपस्या पुरा हुईल नै रह,तर तै तपस्या बिगार डेल्या । मोर तपस्या तैं काहे बिगार डेल्या,मोर तपस्या बिना पुग्ल तैं तपस्या बिगार डेले आब मोर काम बिगर गैल, कि मोर तपस्या पूरा कर,कि मोर काम बना,कि महि जन्नीके रुपम लेह परल । तपस्वी जन्नी अत्रा बात कहत घरीम राजअहिरिया बहुत अप्थ्यारोम पर्ल ओ कहल की ना मै तोर तपस्या पूरा कर सेकम, ना मै तोही छावा देना काम करसेकम,ना मै तोही जन्नीके रुपम बरन करसेकम । मोर घर जन्नी,लरका परका परली बात । जन्नी लरकापरका रहतीम तोही कहाँ जन्नीक रुपम बरन करसेकम । राजअहिरियाके अत्रा बात सुन्क तपस्वी जन्नी कहल की इ बात बिरकुल नै बनी । मोर तपस्या काहे तैं बिगरले । आब बिचम आक मही तपस्या जोर नै मिली । कित पुनः मही तपस्या शूरु कर परी,ज बकी मोर तपस्या ओरैनाही हिसाब रह,जौन दुःख कट्ना काट सेक्ल रलहुँ । आब पुनः तपस्या करना कतना दुःख हुर्ई पता बात की नाई रु कि महि लेह परल,कि महि एकथो छावा देह परल,कि मोर तपस्या पूरा कर परल ।
तपस्वी जन्नीक बात सुन्क राजकुमार अहिरिया बरा मुश्किलम परगैल ओ दुबारा कहल की हे तपस्वी १ मै एक राजकुमार हुईतुँ , राजपुत्र हुईनाके नातेसे मै अनर्थ कर नै मिल्ना हो । जन्नी परली परली दोसर जन्नी लेहम त मोर बाबा दाई,भैयन का कहहीं,उसीम मै बरका राजकुमार हुईतुँ ,बर मनै मै असीक करलागम तौ भैयन का करहीं और का कहहीं । कृपया १ मही इ पता नै रह की तै यहाँ तैं तपस्या करते कहिक । मै कुछ नै जन्थु तोर बिषयम । राजकुमारके असिन बात सुन्क तपस्वी जन्नी कहल की असीन बात हो कलसे मोर तपस्या बिगरलक तोही बहुत बरा पाप लागी । उसीम तैं भविष्यके राजा हुईस । राजा मनै अधर्म नै करथ । मै तोर पाछ कौनो हरहालतम नै छोरबुँ । अन्यथा पापके जिम्मा तैं ले ।
अत्रा बात तपस्वीके सुन्क राजकुमार पापके प्रायस्चित्त भोगक डर डरागैल और तपस्वी जन्नीहन आपन जन्नीक रुपम स्वीकार करना मंजुर होगैल । ओहाँ बन्वाँम राजकुमार ओ तपस्वी घर बनाक रह लग्थ । बहुत दिन होजाईथ घर आपन राजकुमारी,दाईबाबा,भैयन सबकोई व्याकुल होगैल रलह की अत्रा धेउर दिन फेन घर नै घुम्ना का बात होगैल । की बाघ,भाल,सियार खादरल । मुअल जियल कौनो खबर नाहीं कैक घरक मनै बहुत चिन्ताम डुब्जैथ । चिन्ताके कारण सबकोई भावबिहवल होजैथ और हालखबर बुझकलाग चिट्ठी लिख्ना सोंच्थ । सबकोई सल्लाह कैक चिट्ठी लिख्थ । आब राजकुमारी चिट्ठी लिख्ना शुरु कैक लिख्थी की
गित
यचला छोली छोली मै कगजा बनैबुँ रे, नैना कजुल मसीयानी ।
अंगुरी छोली मै कलम बनैबुँ हो मोरी राजा, अहिरिया आवैं ना घरे ।।
वाहरे पाछ लिखुँ मै तितरा मंजोरा रे, बिचमे लिखुँ मै अपनी सन्देश ।
और माजु ठाउँ लिखुँ अपनी स्वरुप हो मोरी राजा अहिरिया आवैं ना घरे ।।५।।
चिट्ठी लिख्क तयार कैक घरम पालल सुगक घेंचाम बाँध देथ और सुगाहन राजअहिरिया शिकार खेल ठाउँक जानकारी करैथ और यहँर उहँर अल्मलाईक डर सबचिजके जानकारी करैथ । उत्तर दिशामे आम अमरुद, दख्खिन दिशामे केरा कटहर,,पुरुब दिशामे सुम्तोला,पछ्छीउँ दिशामे लिच्ची आदी फलफुल बात । इ चारौ दिशाके फलफुलके जानकारी और बैरी दुश्मनसे बँच्ना समेत जानकारी कराके सगाहन पठादेथ । सुगा वहाँसे चलथ तर सुगा उत्तर दिशामे जाक आमअमरुदमे भूलके फेन घर लौट्क अंगनाम रुखुवाके पतिया बदर बदर गिरा देहथ । जब राजकुमारी बाहर अइथी त पतिया गिरल देख्थी और कहथी की आझ पतिया के गिराईल कहिक उप्पर हेरथी त आपन सुगा । सुगाहन बलाइलम सुगा तर नै आइथ त राजकुमारी दुधभात लेक बलैथी तब सुगा तरे आईथ । सुगा घर लौटल शंकाुसे पुछल्म सुगा कहलकी चिट्ठी बाँधल लसरी घेंचा सँतीयाईलम घर आईल बहाना पार देहल । फेन घेंचाके लसरी ढिलढिल करक पठादेथ ।
अबकी दख्खिन दिशाके केरा कटहरम भूलजाईथ । दुसरा बार फेन घर लौटथ ओ ओस्तहींके पतिया गिराईथ त राजकुमारी अचम्म परथी, और रुखुवाम हेरथी त आपन सुगा । दुबारा बेर फेन दुध भात लेक बलाक पुछ्थी त सुगा उह घेंचा सँतियाइल कहल । दोसर बार फेन लसरी ढिल कैक पठैथ । तिसरा बार पुरुबके दिशाम जाक सम्तोला खैनाम भूलजाइथ ओ घर जाक रुखुवक पतिया गिरादेहथ तौ राजकुमारी जानलेथी की सुगा पक्का फलफुलम भूल्क घेंचा सँतियैनक बहाना लगाक घर घुम्क आईथ कहिक तिसरा बार खोब गरियाक पठैथी त सरासर राजअहिरिया रहल ठाउँम पुगथ । वहाँ जाक रुखुवाम बैठक पतिया गिराईथ । पतिया गिराईल देख्क राजअहिरिया अचम्म परके कहथ और दिन पतिया असिक नै गिरथ आज काहे पतिया गिरता सोंच्क रुखुवाम हेरथ त आपन सुगा घेंचाम चिट्ठी बाँधल देख्ल और बलाक चिट्ठी खोल्क हेरथ त आपन शिकार खेल आईल खबर लेहक लाग लिखल रहथ । चिट्ठी हाल सुन्क राजअहिरीया बहुत बिह्वल होक घर लौट्ना विचार करथ । वहाँसे फेन आपन हाल लिख्क चिट्ठी लिख्क सुगाके घेंचाम बाँधक पठादेथ ।
घर जैना त जैना तर तपस्वी जन्नीहन कसिक लैजैना बरा समम्या । राजअहिरिया कहल की अत्रा दिनसम तोरसंग खेलहाँ कैदरनु । आब तोर लडका हुईना सम्भावना फेन होगैल बात तैं मोस पाछ छोरदे कहलमे तपस्वी कहल की जबतक मोर कोखसे लरकक मुह नै देखतसम तोहीन मै नै छोडबुँ । अत्रा बात कहलम राजकुमार विवशम परगैल और तपस्वीहन लेक घर रवाना होगैल । इहाँ घर सँझला भैया जानदरलीन की दादु सँपुवा बरगके जन्नी लेक आईता कहिक । दादु भौजी घर पुगलम गित गैथ की ः
गित
दादु मोर अईल बनपरुदेश रे , भौजी करली बरी मान ।
माथकै तिकुली माथ तुहुकाई हो मोरी राजा,अहिरिया आवैं ना घरे ।।६।।
जब राजअहिरिया घर पुग्थ त राजकुमारी सोनक झाँरीम पानी देहथी और सेंदुर, फुला घलाक सम्मान करथी । और कुशलक्षेमके हालखबर लेहथी ओ साथमे आईल जन्नीक बिषयमे पुछ्थी। राजअहिरीया बिभिन्न बात सुल्झाके राजकुमारीहन जानकारी करैथ । बहुत दिनकेबाद भेटघाटमे बिभिन्न वार्तालाप हुइनक बादम राजकुमार मैयाई जैथ ओ राजकुमारी घट्वापानी करगैलम अथवा अन्त अन्त जहाँ जैना वहाँ वहाँ जैना करलग्ल । घट्वा गैल्म घट्वाम जाक पानी पिनक बहानाले पानी मँग्थ ।
गित
सुन तैं अगुली सुन तैं पछुली,सुन तैं बिचकी पन भरनी ।
बुँदा एक पनियाँ पियाई देओ हो मोरी राजा ,
अहिरिया आवैं ना घरे ।।७।।
तब बरकी जन्नी कहथीस की अत्रा दिन मैयाँ नै लग्ना ,भख्खर मैयाँ लग्ना त पाछ पाछ करना,कहिक गितम जबाफ देहथीन ।
राजकुमारी( सोन सुतरी मोर इँररा बिरँरा रे,रुपनकै घैंला ।
जेकर मोल लछत्तर रुपियाँ हो मोरी राजा,अहिरिया आवैं ना घरे ।।८।।
तेकर बादम दिन बितल साँझ हुईल । सँझला भैया ज्ञानगुनके सिपार रहलीन । आपन दादुहन एकान्तम लैजाक, भौजी सँप्वा बरगके जन्नी हुईती,इ जन्नीक संग रातक नै सुत्ना,एकम सुत्लसे सँप्वा रातके काट्क मुवाँदारी कहिक राजअहिरीयाहन जानकारी करैथ और बँचक लाग रातभर खटिया भाँगक रात कटैना जुक्ती बता देहल । रात हुईल, नंगा खटिया मगा गैल ओ खटिया भँगना लसरी मगागैल । खाना पिना खाक आराम कैक सुत्ना घरीम राजकुमार कहलकी दोसर जन्नी लन्लसे नयाँ खटिया अप्नही भाँग्क मात्र सुत मिल्ना हमार चलन बात तबमार खटिया भाँग लि तब नयाँ खटियाम सुतबी कहिक खटिया भाँग लग्ल । गोंरी दारगैल, कुछ बध्धी भाँगक बिगरगैल कहिक घरी घरी उघल्ना,फेन भँगना करलग्ल । भाँगफेन घरी घरी उघलना दे्ख्क तपस्वी जन्नी मिच्छाक कहथी की ः
गित
घनि खाट उघले घनि खाट पघले,तुहाँरे दादु जे बरी भकभोंदना ।
सारी रात दिया देखाई हो मोरी राजा, अहिरीया आवैं ना घरे ।।९।।
घरी घरी ओस्तहींक करके रात बितल । रात बित्नक बादम काल्हिक बिहान राजअहिरीयाके सँझला भैया कहलिन की दादु रात त जसिक तसिक बित्गैल तर यकर दोहोलो कटैलसे मात्र एकम सुत मिली । भैयाके अत्रा बात सुन्क राजअहिरीया कहल की भाई जन्थो कलसे यकर दोहलो कटा दी । दादुक बात सुन्क राजअहिरीयाके सँझला भैया चुप्पसे बरग कटैना हरेक सामग्री जुटाई कहिक सामान जुटल बादम गाउँसे बाहर जाक तपस्वी जन्नीक बरग कटादेथ । उसके बादम दोसर दिनसे राजकुमार राजअहिरीया दुनु जन्नीनकेसाथ ओ आपन घर परिवारनसे अमनचयनके साथ रहलगग्थ । नयाँ जन्नीके परछौटीके लाग बहुत बहुत सरजाम करथ और देश देशके राजा रजौटन निउँता देजाजाईथ । धुमधामके साथ परछौटी करना योजना बनल । परछौटी करना गते बार फेन तोक गैल । बहुत भारी सरजामकेसाथ परछौटी कैगैल । बरा बरा राजा रजौटा निउँता स्वीकार कैक परछौटीम आईल रलह। मही फेन बत्कोही बतोइलक साटो भोज खाक जाइ कहतलह । तर मै कहनु की आजकाल बहुत जार बा , खैना त कहाँ जाइ,पर जिउ बाँची त खैना सब दिन मिल्ती रही कहिक मै जारसे थुर थुर कँप्ती घर आगैनु । औरजन प्रेमके साथ खैती रलह ।
ल्यो त अत्र हो बात अत्र हो चित,सुन्नेले सुनको माला,भन्नेले बैकुण्ठ जाला । यो कथा भन्ने बित्तिकै सरासर आईजाला ।

मोहन लाल चौधरी
फकलपुर,हालः धनगढी गाउँ ।