अापन हुइना मनै

    संस्मरण कथा                                 
             तुलाराम सनम, कैलाली  

           Kushmisanam@gmail.com

     

             तलाराम

 

                                   विद्यार्थी जीवन जात्तिके एक सुन्दर ओ स्वतन्त्र जीवन रहथ । मै फे विद्यार्थी जीवनके पन्वा“दार रंगमञ्चमे स्वच्छताके वातावरणमे रमेैटी आपन जवानीके पौली डोलैटी रहु“ ।  पहर्नाके अलावा कबु गुल्ली डण्डा खेल“ु तो कबु बैरागपण हे हटाईकलाग नुकिकसा“धा खेल्टी आपन दिन बितैटी रहु । लर्कापणके समय न हो कबु छेग्री चराईबेर बन्वामे फुत्की बिनि, बेम्ती खोजी, लर्कैलर्का सल्लाह कर्के बन्वामे कोसम खाई जाई, कबु कबु त बन्वामनसे बन्कु“रा फे मारके लानी । कुल्वामे लहैलेक, बालुमे लोटलेक, पुलेमसे कुत्गलेक, सोरैह्या खेल्लेक आभिन मानस पटलमे याद बा ।

समय आपन गतीमे चल्टी रहथ । पहाईके संगसंगे मै फे उमेरले भारी हुईटी रह“ु । एक दिनके बात हो, आपन दिदीक घर पहुनी खाई आईल बेलामे एक स्वर्गके अप्सरा मेनका जैसिन अपरिचित नारीसे मोर भे“ट हुईल । परिचय बरा मुस्किलसे कर्नु । नाउ“ ईसा रहिन । ईसा सा“वरमे सुग्घर, स्याउ जैसिन गाल, मृगक तेंरा असक झलझल कज्¥यार आ“खी रहल चंचल आशिका रहि । मोर स्कूलसे तनिक्के दुरके स्कूलमे उ फे अध्ययन करी । स्कूलके सोझ, शालिन ओ अनुशासित विद्यार्थी ईसा धैर्यशिल, आ“ट ओ साहस रहल नारी चरित्र रहि । हमार पहिला मिलन हे निरन्तरता देना ओ समुन्द्रसे फे गहिर मैया हे आभिन अटल ओ अटुट बनाईकलाग न हो सायद उहे क्षण हे ईसाराबाद कर्ती उ मोर नाउ“मे पहिल पे्रम पत्र लिख्ली । रुमालके एक पोक्री अम्लीक भित्तर एकथो कागजके  टुक्रा लैके मोर एकदमै मन मिल्ना संघ¥या ईश्वर अईनै व कनै सनम तोहार पह“ुरा, लेउ धरो । मै हतार हतारमे ईश्वरके नानल पहु“रा छिन्के लेनु ओ पोक्री खोल्नु तो ओम्न धेउरे अम्ली ओ एकथो छोटमोट कागजमे टुक्रा भेटैनु ।

एक्कासी मोर मन डराइ असक करल । मोर मुटुके कम्पन शक्ति बाह्रे लागल । धकधिउरा धकधक कर्के मोर सारा शरिर हिलाई लागल रहे । यि खबर मोर दाई बाबा पता पैहि“ तो मोर का हालत हुई ? मै यि कागज हे कहा“ नु“काके धरु ? ओ सक्कु जहनसे कैसिके छिपाउ“ ? कहना मोरिक मनमे प्रश्ना उपर प्रश्ना थपे लागल । पोक्रीमे रहल सक्कु अम्ली मै ओत्ठही छोर देनु । श्रीफ कागजके टुक्रा केल लैके मै घ“सखन्द्रीमे पेल गैनु । औरे जाने कोई नाई देखही कहिके मै मुटु भत्भतैती रहल बेलम  ईसक लिखल चि‡ी मै नुकके पह्रे लग्नु ।

‘‘ – सनम, मै जौन दिनसे तुहिन देख्नु ऊ दिनसे मै केल नाई मोर टन, मन फे तुहिन छान सेक्ले बा । तुहार मजा आनी बानी, मिठ बोली बचन, ओम्न से फे लजैना त“ुहार स्वभाव देख्के मै जात्तिसे तुहिन आपन मनमन्दिर मे सजा सेक्ले बातु ………..’’

अत्रै पत्र पहर्के मै घ“सखन्द्री मनसे बाहेर निकर गैनु । सारा दिन महिन तो अ“न्धार लागे लागल । खुसीले हो या डर त्रासले हो, मोरीक पौली भुईया“मनसे उप्रे उप्रे दौरे असक पता पाउ“ । आ“खि भरके चकचोंधी लागे असक फे करे । मै दगुर के या निगत गैनु उ फे पता नाई पैनु । आपन पत्थ्रीमे सुत्के किताव धर्ले मै उहे क्षण हे सम्झती रहु“ । सोच्ती सोच्ती कब निदैनु उ फे महिन पता नाई चलल् । एकचोट्टे धुसमुस सा“हिजुन उठनु । भकुवाइल गिदार असक भ“ेभ्राईल उठके मै बम्मा ओर गैनु ओ आ“खी धोधाके गाल पकर्ले बैठ गैनु । तब्बहि दाई पुछल – ‘‘का हुईता छावा ? तोर जुरी तो नाई आईल बा ?’’ मै जवाफ कनु – ‘‘ मोर कुच्छु नाई हुईठो दाई अब्बे भरखर सुत्के उठ्नु बस भेभ्राईल असक लागता । अत्रै कहिके मोर बात बनगैल ।

बर्षक समय रहे । एकघची रहिके दादा भौजी हुक्रे खेत्वामनसे आईगैनेै दादा हुक्र खेत्वा मनसे आके लहैती रहै । बर्का भौजीक एकठो छाई लक्ष्मी खतियम सुत्ले रहे । भौजी खेत्वमसे अईतीके भतिजिया हे दुध खवाइकलाग पत्थ्रीम ओ“दर गैली । मझ्ली भौजीजुन अब बेरी खौक्ना तयारीमे रहि ।

मै अगद्दु भात खा सेक्लेक ओर्से एकठो दिब्बी ( दिया ) उठैनु ओ आपन कोन्तीम चलगैनु । किताव पहर्ना छोर्के मै फेनो ईसक देहल पत्रके बा“की अंश पह्रे भिर देनु ।

‘‘सनम, मै मच्छी मर्ती रहल बेलम तु“ आमेक रुखुवम बैठ्के महिन खुब चलाईत रहो ना । तु“हार चल्ना बानी । सुग्घरसे हस्ना हसिन चेहरा ओ तुहार सक्कु क्रियाकलापले मै जात्तिसे प्रभावित हु सेकल बाटु । अब यि जिन्दगीके एक हि साहारा तु“हि हो सनम । मै तुहार बिना अकेल्ही कब्बुनाई रहे सेकम । ‘‘
                                                                      उहे तु“हार ईसा

पत्र ओराईल, मै मौन हुके सोच्नु । नियालके हेर्नु आपन जिन्दगी हे । देख्नु बहुत लम्मा सफर । अधुरा जिन्दगीके पहिल बाधकरुपि प्रेम पत्र हे मै बारम्बार दोह¥याके पह्रे लग्नु । ईसा नारी रहलेसे फे असल प्रेम प्राप्तीके लाग ……. .उ फे मोर जैसिन (छोटी रहल समयमे) प्रेम से नरत करुईया हे प्रेम प्रस्ताव धारके आपन बहादुरी देखाईल रहि । ईसक आ“ट, साहस ओ हिम्मत देख्के मै धिरे धिरे उ पत्र हे स्विकर्ना बाध्य हुइनु ।

प्रेम मे नाई अ“त्कना मोर कत्तरमन ओत्ठहीसे बदल्गैल । महिन लागठ प्यार जात्तिसे पत्थर हे फे पिघ्ल्याई सेक्ना जादु मन्तर हो । ईसा ज्या जैसिन हुईलेसे फे मोर जिन्दगी बदल देली । मै अभिन बारम्बार उ हे पत्र हे पहर्ती रहनु ।  झनझन मैया“ ईसाके ओर पिघल्ती गैल । पिघ्लल् मैयाके सहारामे जीवन जिए लग्नु ।  अर्थात ऊ बेला मोरिक सारा संसार खुसीले छा“ईल रहे ।  जस्ते तल्वामे कत्कुईया फूला फुल्के मस्का मर्ती रहे । गुलावके फूला सारा संसार हे मैयाके अभास करैती हमार प्रेम जोडी हे स्वागत कर्ती रहे ।

ऊ पल जीवन जिना बेहद खुसीके क्षण बनल रहे ।  हस्ती खेल्टी रमैटी समुन्द्रक हल्कोरा फे मनभर के छल्के लागल रहे । बसन्त ऋतुके याम सिरसि¥या बयालके संगे  मैयाके भावना बदल्टी सुहाग सम्राज्य उच्चताके पहार हे चुम्ती रहे ।  मानौ चिरैं पंक्षिनके जोरा असक हमार जोरा क्या मस्त जमल रहे ।

भला दुनिया“ ज्या सोचे, ईसक ओ मोर जिन्दगीक सफर संगसंगे चले लागल ।  कबु हम्रे संगे बजार घुमे जैना करी । कबु जुन सुनशान बिलकुल एकान्त बन्वामे दुई जानेकेल हमजोरी बन्के घुमी । फिलिम हेर्ना, नाचकोरमे सहभागी हुईना, मेला मन्दिर घुम्ना हमारलग समान्य बनसेकल रहे । समय अस्तहीके बित्ति गैल । दिनरात, पल कर्ती बेैशालु जिन्दगीके सहयात्रा मनोरञ्जनात्मक तरिकासे आगे बहर्ती गैल । जीवनके लिला भित्तरके गल्लीमे हमार प्रेमरुपी घोरबग्गी आपन बा“ह पकर्ले चल्ती रहल । रोमान्टीक समयके अलावा हमार पह्राई फे धिरेधिरे चल्ती रहल । संसारके परम्परा, रितिस्थिती, अपन गतीमे चल्ती रहठ । समय फे परिवर्तनशिल बा । मानवरुपी प्राणीके रुपमे यि संसारमे जलम लैसेकल पाछे सुख दुख मिलन बिछोड हासी खुसी लगायतके अनुभव कर्ना फे स्वभाविक रहे ।  

मै चिहाके हेर्नु जिन्दगी, पुरुबके लाली विहान पच्छिउ“के मझ्धार कोन्टीओर हेरैटी रहे । कल्पनाके ताजमे मै मौन हुके आपन जिन्दगी हे फटक के हेर्ना कोशिस कर्नु । फुरेसे मोर जिन्दगी गरिबीके महासागरमे सयर कर्ती रे । मोर जिवन शिक्षाके छा“ही पैनासे बञ्चित हुईना अवस्थामे रहे ।  घरेक आर्थिक कमजोरीके कारण एक ओर मोर पह्रई छुट्ना अवस्थमे रहे कलेसे औरे ओर जुन ईसा ओ मोर प्रेम सम्बन्ध समाजके आ“खिम क¥या पत्ति बा“ध्के खुलेयाम र∙मञ्चमे उपस्थिती जनासेक्ले रहे ।
आपन पह्राई हे मध्यनजर कर्के आर्थिकके लाग मै कुछ समयके लाग भारतओर जैना प्लान बनैती रहु। एकाएक मोर मन पैसाके सजनामे डुबुल्की मर्ती जाईत रहे । रातीक समय रहे । पथ्रीमे ओदरके मै यि सपना देख्टी रहु । कुछ पैसा कमैम ओ आपन  एस. एल. सि. परिक्षा जैसिक फे सफल पारम कना सोचले मै मगन रहु ।

एकाएक क¥या बद्री अकाश हे छा“ सेक्ले रहे । पच्छि“उके आ“धी बयाल तुफानी जोशके साथ चले लागल रहे ।  पथ्रा पानी ओ बौछ्रह्रा बयालसे मोर कोन्टीमे फे पानीके बुंदीबुंदा टीप्के लागठ । जुर सित्तर अनुभवके साथ चादरके सहाराले ऊ पुरा रात विवश हुके मै अकेल्ही बितैनु । समय जात्तिसे आपन गतीमे निगठ । आ“धी बयाल जत्रा जोस्साईल रलेसे फे उच्चताके पहार हे न“घ्टी हिम शिखर गगनचुम्बी डम्माराके ओल्झारसे फेरसे पुरुबके लाली विहान केर्नी रंगिन पंख्ना फैलैटी मजोरुवाके रुपधारण कर्टी सारा पृथ्बीभर छित्का सेकले रहे ।

बात उठल बाबा से, मै कनु – “बाबा मै कुछ समयकेलाग ईण्डिया कमाई जैम । एक दुई महिना ईण्डिया रहम, दुई चार हजार कमाके लानम ओ अपन पहई पुरा करम तो नाई बनी ?” बाबा धिरेधिरे मुन्टा हिलैटी सहमती जनाईल । मै अप्नही पैसा कमाके  अपन पह्राई पुरा करम कहना सोचले मै एकओर खुसीके अभास कर्ती रहु कलसे औरेओर जुन ईसक देहल सुकोमल मैया बिच डरग्रीमे ना“गर हुईती रहलेक फे मै महसुस कर्ती रहु । ज्या हुईले से फे मोर ईण्डिया जैना प्लान मजबुत रुपमे तयारी हु सेकल रहे ।

गाउ“घरके बात न हो, एक कान दुई कान मैदान हुईटी यि बात ईसक कान सम पुग सेकल रहे ।  मोरिक ईण्डिया जैना खबर पाके ईसा  हमार घरसम आ पुगल रहि ।  मोर ठन अईटीकी मोर ईण्डिया जैनाके कारण बार बार खोद्या खोद्याके पुछे लग्ली । हर लावा काम आश्चर्यजनक जरुर रहठ । मै एस. एल. सी. के तयारी कर्ना मनै एक्कासी ईण्डिया जैना कलक फे उ समयमे हमार छिमेकीमे अचम्मके बात रहे । ईसा हर अ“ख्रा उहे बोली निकारी कि ईण्डिया जैनाके कारण का हो? बस विवश हुके मै आपन बाध्यात्मक परिस्थिती ओ अन्तरमनके कहानी सुना देनु । घर छोर्के दुर देश कमाई जैना रहर केकर पो रहठ र ⁄ मै तो कठु दुर देश कमाई जैना कलेक घरेक मजबुरी ओ गरिव घर जन्मलेक एकठो सजाय फे हो । मन भित्तर कत्रा भारी सपना रहठ । सपना सकार करेकलग  पौली डोलाई लग्बो तो बाधकरुपि आर्थिकमण्डी खडा हु देहठ । महिन लागठ आर्थिकमण्डी गरिवनके सवसे भारी दुश्मण हो ।

मै आपन  विवशता, बाध्यता ओ ईण्डिया जैना बास्तविक बात ईसा हे बटैटी रहु । एक्कासी ईसाके आ“खी मनसे चा“दनीके मोतीदार हिराके बर्षात टपटप टिप्के लग्लीन । उ मौन हुके मोर कानुमे पलट गैली । शु“कशु“क कर्टी मौनताके भाषामे ईसाराबादके झन्कार मोर कानुभर फैला देली । हुकार आ“खीमनसे आ“शके बलिन्द्रधारा बहे लग्लीन । मोर मन फे निराशाके तुफानी बार्षात बर्षैटी समुन्द्रक ज्वारभा“टा जैसिन आ“शके हल्कोरा मर्ना करिव पुगसेकल रहे । मने मै एकठो मर्द न हु नारीसे तनिक बल्गर मुटु कर्के आपन आ“शरानी हे रोक्ना प्रयास जरुर कर्नु ।  

उ दिन सिर्फ मौनताके बद्री, स“घ¥या बनल रहे । दिनभर सुखना दुखनाके बाट बत्वैटी बिना लज्जास्पदके हम्रे मोर कोन्टीमे बैठ्ले दिन बितैली । मोर अन्तिम समय हुईलेक ओर्से मै उ दिन ईसा हे  हमारे घर पहुनी रोक्नु । ईसा फे रातभर मोरे घर रहना प्लान बनाईल रहि । बेरी जुन हु सेकल रहे । सक्कु जाने बेरी खाईकलाग मौजुद हो सेकल रहि । ईसा हाली हाली भात खाके मोर कोन्तीमे चलगैल रहि । एक तो ओस्तहि फे नारी घरेक लक्ष्मी हुईतै । उ दीया सुल्गाके मोर कोन्टी हे ओज्रार कैले रहि । मै जुन बाबा, दाई, दादा, भौजिनसे अन्तिम गफ कर्ती रहु । आपन गन्तब्य, लक्ष्य, ओ भविश्यके बारेमे गफगााफ कर्ती मै मजाले बाट बत्वैटी रहु । बाट बत्वैटी बत्वैटी रात फे बहुत गुजरगैल रहे । तब्बहि मै फे आपन कोन्ती ओर स्वर्गिय निद हे ईन्द्रााशनरुपि बिस्तरासम पुगाईकलाग आपन कोन्टीओर लमक देनु । ईसा जुन मोर अस्रक डगर हेर्ती बैठल रहि ।  

कोन्तिम पुग्ती कि मोर लजर ईसक आ“खिम परल । जौन आ“खिमसे बलिन्द्र आ“शके लडिया बहट रहे । मै मौन हुके हेर्नु । एकऔरे जहनसे हमार दुई जोडीनके आ“खी जुढल ।  एकघची तो मै ईसा हे हेर्तीक हेर्ती रहिगैनु । मै धिरेसे ईसक पिंठिमे स्पर्श कर्नु । ईसा आउर पिठी खोल्त्यार कराई असक कर्ली । मै ईसाके नरम, लम्बा लम्बा भुत्ला खेलैटी – “ मोर दोश ईसा, तु फे अत्रा छोट मुटुके बातो यार ⁄ दुई चार दिनके लाग कुछदुर गैले से अईसिनके रोईक परठ लाती ? ” अत्रै कनु कि उ मुन्टा उठाके महिन हेर्ली ओ मोर छातीमन चपत गैली – “ सनम, तोहार विना कैसिके  मै अत्रा धेर दिन कतैम ⁄ तोहार विना मै कब्बु नि अकेल्ही रहे सेकम । सनम तु महिन छोर्के नाई जाउ ना …….. ⁄”

ईसाके छल्बलाहट सुमधुर बोली महिन कुछ हदसम निराश करल । ईसाके बात बास्तविक रहलेसे फे उ बाट हे स्विकारे सेक्ना मोर ठन कुच्छु औंकाट नाई रहे । काकरे कि मै आपन जिन्दगीके महान ओ आदर्श मार्ग खोज्ती रहु । समाजमे पहर लिख्के मान सम्मान सहितके जिन्दगी जिना मै भारी सपना देख्ले रहु । गरिव रहलेसे फे स्वतन्त्र ओ आदर्श जिवन जिना मोर एक्ठोकेल महान सपना रहे ।

रातभर अस्तहि अस्तहि बात कर्ति हम्रे रातीक तिस्रा प्रहर बिता सेक्ले रहि । एकदोसरसे बात बत्वाईत बत्वाईत हम्रे दीया फे फु“केक बिस्रा धर्ले रहि । पाछे ढिपढिप दीया हे फु“क्के हम्रे निदैना तयारीमे रहि । निद्राशन हमार समिपमे पुगल । निन्द्रादेविक कानुमे हम्रे दुनु प्राणी कब निदैली हमन फे पता नाई चलल ।

विहानके  ९ बजे हमार सफरके मुहान फूत्ना रहे । समापनके समुन्द्रसम सकुल पुगेकलग  दुब्या फुला, दुबक धर्रा, ओ चाउरके टीका घरेक मनै सजाईल रहै । बिधिबिधानके साथ मोर बिदाबारी कैगिल । दाई बाबा हे धोक सलाम कर्के मै आपन गन्तब्य ओर निङ्ना तयारीमे रहु । तब्बहि ईसा मोर कन्धामनसे झोला लैके कुछदुर सम मोर संगे जैना सांकेतिक भाषा बोल्ली ओ मोर संगसंगे निगे लग्ली ।

हम्रे डगरमे गफ कर्ती जाईत रहि । ईसा कलि – “सनम अत्रा धेउर दिनके लग महिनसे दुर हुईतो । ओहा“ जाके यि कुवा“री मथ्वा हे ना भुलैहो ना । मै हर रात हर दिन तुहार अईना अस्रामे रहम । सनम जाउ मजासे काम करहो ना । ” ईसा अत्रा बात कहिके सेक्ती कि मै फे कनु – “ई तो विधिके विधान न हे यार ईसा । कबु सुख कबु दुख यि तो संसारके नियम हो जे । मै दुरदेश जैतीके तुहिन हिर्गिस भुलाई नाई सेकम । आपन शरिरके मजासे ख्याल करहो । कुछ समय पाछे हमार जरुर मिलन हुई । मै तुहार कु’“वारी मथ्वा रचाई जल्दी अईबु ।” मै ईसक आ“श पुच्छ्टी फेरसे कनु – “महिन दुर देश पठाके कहु तु“ औरे भोज तो नाइृ करलेबो ?” खेल्मस्तिक बाटमे ईस सुघ्घर मुस्कान दैके कलि – “ औरे जहनसे भोज कर्ना रहत तो तुहिन यहासम कहु“ पठाई अईतु हो ⁄” । हम्रे दुनु जे मेरमेरिक बात बत्वैटी रही । एक घचि पाछे बस स्टेशन पुग्ली । ओहा पुग्ती कि मै बसके सिटमे बैठ् गैनु । बसमे बैठल पाछे ईसा सरपराईज गुलावके फूलक झोगदासे महिन बिदा कर्के बिदाईके अन्तिम हात हिलैटी महिनसे धिरेधिरे दुर हुईटी रहि । बसके सिसा डगर हात हिलैटी मै फे ईसाके बिदाई हे स्विकर्नु । बस अपन गतीमे चले लागल बरा जोर, बहुत रतारमे …………..। क्षणभरमे ईसा महिनसे दुर हुईली । मै जुन ईसक बिदाई लैके बिना गनतब्यक थालनी कर्नु कहा“ हो कहा“ नी …………………

बसमे कब्बु नाई बैठ्लेक मनै मै, कुछ दुर पुग्ती कि मै महा जोर से घुम्रीयाई गैनु । अक्के घचि तो मै मतवार असक करे लग्नु । बसके सिसा डगर ओक्लैटी दिनभरके सफर कर्के भारतके भारी शहरके मै कल्पना कर्ती रहु“ । नेपालके मनमोहक दृष्य, स्वच्छ व शान्त वातावरण, हरियर कज्¥यार बन्वा, हजारौ हजार सुग्घर डगर नघ्ती भारतके चार सय चौरसि पहार पार कर्के जात्तिसे मै भारतके एक अजिवके शरमे प्रवेश करसेक्ले रहु । तारिकपारा गारी चल्ना, मनैनके मेला बरे भारी रुपके रहे । आपन गोरा आगे बरहाईकलाग एक पौली टेक्ना फे कर्रा रहे उ ठाउ“ महिन जात्तिके बरा अजिवके लागल ।

मै नेपालके ग्रामिण समुदायमे जन्मलेक ओर्से शहरके रहनहन, चालचलनसे मै बिर्कुल अनबिज्ञ रहु“ । मै भारतके पहिल सफर नैनीताल पहारी ईलाकाओर करल रहु“ त फे बहुत अजिवके शहर लागल रहे महिन । उहे शहरमे मै आपन सजिव पौली भर्नु । कुछ पौली आगे बहर्नु । अजिव अजिवके घर, अजिव अजिवके बिज्लीबाला, तानाबाना शहरके रमझम मनै फे अजिव अजिवके रहै । सक्कु जाने आपन आपन तालमे, आपन आपन काममे, आपन आपन शानदार पोशाकमे सजिसजाउ मनैन् देख्के मै बहुत अचम्ममे पर्नु । तब्बहि मै आपन जिन्गी हे खित्कोर्ना प्रयास कर्नु कि –  “मै के हुईतु ? ओ यि दुनिया“मे मोर पहिचान का बा ? मै केकरलग का करतु ? का करे परि ? बस अस्तहि अस्तहि मनमे सवाल उठे अपन बारेमे ।

दिन बित्ति गैल । फूर्सदके समयमे शहरके आसपासमे घुम्ना मै फे मौका पैनु । यहा“ बिग्दल नेपालीनके सैल बगाल आपन आ“खिसे देखे मिलल । कोई नेपाली पहारमे डगर बनाईकलाग बालु ओ बेल्चमे ब्यस्त रहै ।  दिन भर पसिनै पसिनासे लत्पटाईल देंह सहित बम बलास्ट कर्के डम्मारा भस्कैटी रहै ।  नेपाली हुक्रे भारतके पहार मनिक खोल्ह्वा खाभर भस्कैटी पुल बिचके लडियक ढिकुवम विवश हुके रमैटी आपन निरही जीवन ब्यतित कर्ना बाध्य रहै ।

यि दृष्य देख्के महिन बहुत गहिरसे सोच्ना बाध्य कराईल । उ बेला मै यहा“ मौन रहु । नेपालीनके यथार्थ दार्दनिक संघर्ष मै आपन आ“खीसे देख्ती रह“ु । नेपाली, जे ज्या जैसिन स्थितीके रलेसे फे भारतमे एकदम निम्नस्तरके काम कर्ना बाध्य रहै ।  

लावा ठाउ“के वातावरण दिनप्रतिदिन मोर मन हे उठलपुठल कर्ती रहे । मै हरेक दृष्टीकोणसे लावा शहरके बारेमे अवलोकन करु“ । दत्तचित्त हुके सोचु, अचम्म लागे ⁄ कबुकाल तो बैराग फे लागे ⁄ उकुसपुकुस फे लागे । शहरीया लवण्डी तो बिना लाजके बिना शरमके रठै कना फे मनमे भान हुए । अत्राकेल कहा“, जौन चिज पलभरमे मनैनके जिन्गी बिगारे सेक्ना खन्ढक कोरठ् । दारु बेच्ना जैसिन काला ढण्धा मानजिना पेशा यह“क डिग्री करल मनैन फे बरा लिरौसीसे करट भेटाईल रहु“ । मानौ पैसा सबसे भारी चिज हो कना जैसिन । हो पैसासे भब्य बंगला, नोकर चाकर, मोटर, कार, कलकारखाना, अनेक सुखसुविधा, ऐस आराम, मोजमस्ती पैसा से जरुर मिले सेकी मने महिन लागठ खुसी, मस्त निद, सामाजिक प्रतिस्था, मान सम्मान, ईज्जत, पैसासे किन्के कब्बु नाई मिली कना मोर मानस पटलमे पहिलेसे छाप बन्के बैठल रहे । पैसा बहुत कुछ हो मने सबकुछ नाई हो । तर शहरमे सभ्य जिन्गी जियकलाग प्रतिबद्घता करल मनै मान सम्मान ईज्जतसे फे धेर पैसा हे माया कर्थै । यि हे जो महिन धुब्र सत्य लागल । पैसा भगवान तो नाई हो मने भगवानसे कुछ कम फे नाई हो कना महिन तब्बहि से महसुस हुईल ।  

यह“क मनै तो लिखापह्रि करल । दिमागी मन,ै घुम्नाहा कुर्सीमे बैठ्ले सब काम कम्प्यूटरसे करैं । बैठ्ले चाय मगैना, छोटछोट गल्टी कर्ती कि लेबर हुकन ग¥याई पैना सरकारी अधिकार पैले रहै । मै, ऊ, ओ हम्रे, विश्वके शिर सगरमाथा रहल अर्धविकाशोन्मुख देशके मनै । लम्बा लम्बा लडिया रलेसे फे खेत्वामे सिंचाई नाई पुगल गरिव राष्ट्रके मनै । उ फे प्रवासी ठाउ“  । कमैया कम्लरी प्रथा जडित थारु समुदायके कर्मठ, विर, वहादुर, पसिनासे लराई कर्ना मनै हम्रे उ हे कम्पनिमे सक्कु जाने लेबरके रुपमे काम कर्ना विवश रहि ।

नेपाल स्वतन्त्र ओ स्वाभिमानी देश हो । नेपालीनके अपन मेरिक मान सम्मान ईज्जतके साथ काम कर्ना नेपाली मल्गर भुमि रहती रहती भारतके भुमीमे लेवर जैसिन काम करे जैना नेपालीनके बाध्यता महिन कुछ हदसम निराश जरुर कराईल । आपन घरद्घार, परिवाार, दाई बाबा, लर्का पर्कन छोरके दुरदेशमे लेवरके काम कर्ना नेपालीनके बाध्यता देख्के मनि तो हमार देशके धरोहर सगरमाथाके शिर तनिक झुकल असक लागे । लम्बा चाकल लडियाके गहिराई चक्लाई तनिक खुम्चल असक लागे । मने का कर्ना हो पापी पेटके लाग निर्दोष हाथ गोरा चलाई पर्ना धर्ती मनिक सक्कु प्राणिनके निस्वार्थ कर्तब्य रहलेक ओर्से यि स्वार्थी दुनिया“मे निअर्थ जिवन जिना विवश रहि।  

ज्या जैसिन रहले से फे मै काम कर्ना कम्पनि बहुत भारी रहे । अजिवके रहे । धेर गरिवगुरुवालोग काम पैले रहै उ कम्पनिमे । जिविका मजैे से चलिन । मोरिक यहा“ अईलेक फे धेर दिन हु सेकल रहे । काम मन नाई पर्ले से फे धिरेधिरे मै यह“क वातारणसे घुलमिल हुईती रहु । कोह्या करी नि तो घामे तो मुहि कना असक मै फे भारतमे पुग सेकल पाछे जसिन काम रहलेसे फे कामसे भर मै पाछे नाई हट्नु । कारण – मोर बहुत भारी सपना रहे । ऊ समयमे अप्नहि पैसा कमाके एस. एल. सि. पास कर्ना मोरिक आगे बहुत भारी आर्थिक चुनौतीरुपि पहाड गरगराके ठह्या गैल रहे ।

मै प्रवासके बहुत दिन गुजार सेक्ले रहु“ । काम कर्के फुर्सद मिले तो रातके सक्कु जाने सित्राई ओ गलगलाई । सक्कु जाने आपन आपन घरेक  बात बत्वाई“ । खित्काली मनै जुन अपन अपन जन्नीनके बात बत्वाके ठत्ठा मारमारके हासैं ओ गल्गला गल्गलाके बात बत्वाइर्“ । कबु कबु मै फे उहे लेंहरामे सामेल हुके आपन प्यारी ईसक बयान कर्ना कोशिस करु“, मने हिम्मत नाई परे । का करे कि मै बहुत लज्जालु स्वभावके एकदमै कम बोल्ना मनै रह“ु ।

मै पहिलचोट प्रवास अईलेक ओर्से रहे कि का महिन घरेक याद भर बहुत स“ताय । दाई बाबन से बोल्लेक बत्वैलेक सम्झ“ु । स्कूल गैलेक ओ संघ¥यनसे खेल्लेक पलपल याद आए । ईसक प्यारके रसरस याद करु । कबु कबु तो मने मने ईसक प्यारके फु मन्तर फे बरबरा धारु“ ।

पल, धण्टा, दिन, हप्ता, पाख, महिना कर्ती मोर निश्चित समयावधी पुग्ना फे अब खासै धेर दिन बा“की नाई रहे । सदाके असक रातीक समयमे गलगला गलगला सित्राके हम्रे अपन अपन पथ्रीमे सुते गैली । सुत्लेक कुछ समय पाछे एकाएक मै सपनामे भुलाई लग्नु ………………………
³ “ मोर आ“खिभर पहारके डम्मारक सिन झलझल देखा परल । एकथो सुखल रुख्वामे बैठ्के कौवा बोल्टी रहे काहुन । खै का चिजिक निशान हो एकठो झण्डा फे मौनसे आपन टिपुन्नी तरे झुकैले रहे । उ हे ठाउ“मे एकठो स्वर्गके अप्सरा मेनका जैसिन लवण्डी देखा परल कि उ लव¥या ईसा से कुछ कम नाई रहे ।

एकके घचि आपन रुप धारण करल । आपन सारा चिज बदलके ईसाके जैसिन हसिन चेहरामे मोर आगे गरगराके ठह्यिाई गैल । मै तनिक डराई असक उ लव¥यक आगे पुग्नु कि उ महिन सिमोध लेहल । टोपाके उपहार बहुत मैगर ओ लिरौसीसे ब“त्ती रहे । मै फे विवश हुके प्रति उत्तर जनाईल रहु“ । कुछ चिजिक चाल पाके उ महिन से तनिक दुर हुईल । मस्मस्… मस्मस्… ओकर छा“ही सम्या“ई असक पता पैनु । मै उहिन एकाएक लजर फि“जा हे हेर्ती रहु“ । अक्के घचि पाछे उहे प्रतिबिम्ब झरफरझरफर करे लागल । मोर मन मे डर महसुस हुईल । एकओर त्रासपुर्ण वातावरणके सिर्जना हुईलेक मै आभास कर्ती रहु“ । औरे ओर जुन ईसा आजसे महिनसे बहुत हुईती बाटै कि कना महसुस हुईती रहे ।

एक्के घचि बरा चम्पन गाउ“ असक लागे लागल । लहास उठाईकलाग एकठो घरमे मनै अत्रा हाली जुत्नै कि मनैन् देख्ती कि मोर मानसपटलमे आउर भारी डर पैदा हुईल । मै रुख्वामे बैठ्के उ सारा दृष्य हेर्ती रहु“ । एक बगाल मनैनके जमात मोरे ओर अईती रहे । आगे आगे मरल मुर्दा ओ पाछे जुन मनैनके तैंछोर मैछोर भिड मोरओर अईटी रहे ।  महिन लागे मोर आ“खिमसे बलिन्द्र  आ“सके बु“दा धरधरहुट बहत रहे । काह“ुन रुखुवम बैठ्के रोईती रह“ु । जने कैसिक एक मनैया महिन देखलेहल । यि हे यकर हत्यारा हो यि हे लवण्डी हे मारल कहना अवाज मोर कानमे मनकटी रहे । मोर मुटुके कम्पन शक्ति आउर बाह्रे लागल रहे । सक्कु जाने एक एकठो भ“गौठ लैके मोरे ओर अईटी रहै । सक्कु जाने मारो मारो हत्यारा हे मारो कहे लग्नै । कनि कैसिक मै बैठल रुखुवमसे भागे लग्नु कि मै झसाड्डसे जाग गैनु ।”झ

कैसिन अजिव सपना । कोह्न्यिा चुरिन्यक सपना देख्नु कि का । जव जग्नु तो लगलग थरथर डराई असक मोर छाती बरा जोर हिलट रहे । मध्यरातमे जब मै जग्नु तो आपन हे एकठो अन्धार कोन्टीमे भेटैनु ।  हतासमे आ“खिम स्पर्श कर्नु । आ“खिमनिक आ“श छल्बलैटी रहे । आ“शके लडिया हल्कोरा मारके कहा“ जैना अभियानमे रहे ⁄ पत्तै नाई चलल् । सारा रात मै उ हे सपना सम्झती रहि गैनु । कुछ घचि पाछे भिन्सहरा हुईल, मुर्गी बोल्नै ओ एकघचि पाछे बिहान हुईल तो सककु मनै जागगैनै । आखि मुह“ धोके आपन आपन काममे लग्नै । मै फे ओस्तहिकके आपन दिनचर्याके शुरुवात कर्नु ।  

पलपल मोरिक मानसपटलमे उहे सपना याद अईटी रहे । रातिक सपना बाारम्बार मोरिक मन, मुटू, स्पण्डनमे धक्का मर्ति रहे । मै तब्बहिसे एकान्त प्रिय हुई लग्नु । अकेली बैठ्के सोच्ना, मनैन्से कम बोल्ना, बत्वैना, जिस्कना, मस्कना, चल्ना काम कमे करे लग्नु । मोर ब्यवहार परिवर्तन हुईल देख्के मनै फे अचम्म माने लग्नै । बन जरत सबकोई देखठ मने मन जरट कोई नाई देखठ् । यि हे उखानके चरितार्थ मोर जिवनमे सत्य साबित हुईल महसुस होए । मै रातिक सपना ओ आपन ईसा हे दोहोरो रुपमे सम्झे लागल रह“ु ।

बरा मुस्किलसे समय आपन चक्र पुरा करठ । दशैं अईना एक पाख बा“की रहे । मोर घरे जैना दिन फे आसेकल रहे । सक्कु जाने घरे जेैना तयारी कर्ती रहै । घरेकलग दशैह्या“ समान ओहै किनकान पर्ती रहै । मै फे उहे अनुसार आपन तयारीमे लागल रहु“ । झोला तयार कर्के हम्रे सक्कु जाने खाना खाके नेपाल लौटना अन्तिम तयारीमे रहि । स“घ¥यन बसस्टप सम पठाई आईल रहै । एकघचि पाछे बस फे आ गैल । भारतके नैनीताल पहाडी ईलाका हुईलेक ओर्से ओहा सवारी साधनमे बस सेवा यातायातके लग खतरापुर्ण रहलेसे फे घुम्ना लायक बहुत सुन्दर ठाउ“ हो ।

घण्टौं घण्टा पाछे कुछ दिनकेलाग छोर्के गैल आपन देशके सुग्घर ठाउ“, घोटैल डगर, मनोरम हरियर कज्¥यार बन्वाके दृष्यावलोकन कर्ती मै आपन घरेओर अईटी रहु“ । घरे पुग्ना अब ३ किलोमिटरकेल बा“की रहे । लम्कीक बस पार्कमे पुग्ती कि सक्कु जाने पैदल गाउ“ चलदेली । गफ कर्ती कर्ती गाउ“ पुग्लेक फे हमन पत्तै नाई चलल् । सक्कु जाने आपन आपन घर ओर खोंरकली । तबतक धुसमुस सा“झ हु सेकल रहे ।

मनै कठै माया कना चिज आ“धर रहठ । मने मै कठ“ु माया, प्रेम ओ मोहब्बत कना चिज महान बा । पैसासे फे महान । माया बिनाके यि संसार चल्ना असम्भव बा । यदि यि संसारमे माया, प्रेम, मोहब्बत नाई रहट कलेसे सम्बन्धके अर्थ फे फरक हुई जाईट सायद ।  हरेक मनै जे जिहिनसे सम्बन्ध धर्ले रहट उहे जो माया हो । मै दाई बाबा हुकन सम्मान करु“ । जे मोर ओ ईसक पवित्र प्रेम हे सहर्ष स्विकारके भोजके पहिलेसे ईसा हे मोर घर अईना अनुमती देहल रहै । हरेक तरतिउवारमे, खेतीपातिक समयमे ओ अनेक राहरंगितके बेला ईसा सरासर मोर घर आके घरेक शोभा बह्राईल रहि । नौ बर्ष समके हमार प्यार अमर ओ अजर रहे कना हमार कामना रहे । तव मारे मै अईती कि दाई बाबन ढोग सलाम कर्नु ।  लहाखोर्के, दाई बाबन से सुखना दुखनाके बात बत्वाके उहे दिन मै ईसा हे भेंटे जैना योजनामे रह“ु । धुसमुस सा“झ अन्धारमे परिणत हुईती रहे । मै ईसनके घर जैना सुन्के भौजी महिन कुछ बात कहे खोजी मने भरखर भारतसे अईलेक ओर्से हुई सेकी खुलके कहे नाई सेक्ली ।

ओजरिया रात रहे । मै जोश जा“गर ओ उम∙के साथ बरा रतारमे बहुत बात बत्वैना सोचके ईसा हुकार घर जैती रह“ु । ईसनके घर पुग्ती कि झकिझकाउ उज्जर माटीसे चप्डल घर देख्टी कि महिन बरा अचम्म लागल । तनिक लग्गे पुग्नु की ओईनके अ“ङ्नामे जैना डगरमे दुईठो केरक खम्बा, कलश ओ कलश भर्के फूला सजाईल देख्के मै शसंकित हुईनु । कहु“ ईसक भोज तो नाई हुईतिन कना दुराभास कर्ती आपन त्रसित पौली आगे बरहैती गैनु । लाल पर्दामे लिखल “शुभ – विवाह” शब्द महिन आउर शंकालु बनाईल । एकाएक मै ईसनके घरेओर पेल गैनु । कोन्टीभर मनैन्के जमात ज“राहिमे लागल रहै । सक्कु जहन गलगलाईत देख्के मै कनु – ईसा खोई ? भोजहा मा“गर गैती रहल सबके मुह“ बन्द हुई गैल । प्रेमके पुजारीक बोलल् धावा सुन्के सक्कु जे चुपचाप हुईगैनै आपन मुह फेर्के ईसक ठेगान बताई सेक्ना उ बेला केक्रो हिम्मत नाई परल । एक्कासि अत्रा धेर मनै रहल घर महिन भ“याई असक लागल । मै फेर दोह¥याके उ हे प्रश्न पुछनु – “का ईसक भोज हुई गैल ?” एक जहनके दलगर मु“ह से नरम आवाज निक्रल –“ हा“ अब्बै पठाके सेक्ली ।” अत्रा सुन्ती कि मै पछ्मुर्यै ईसनके घरेमसे बाहेर निकर गैनु । मोर मनमे क¥या बद्री पर्दाके रुपधारण करल । मोर आ“खिमे पत्ति कसल असक सारा संसार अन्धार लागे लागल ।

“ पापी ईसा, विद्यार्थी जीवनमे मोर बा“ह पकर्के अगम गहिर मैयाके समुन्द्रमे कुत्गाके आज अकेली छोरके जैना हिम्मत ⁄ एक जुनी तो का सात सात जुनीसम संगे सुख दुःखके साथ रहना सपना देखाके आज महिन अकेल्ही बनैना यि हे हो तुहा“र चाला ⁄⁄ ” कहती मै ईसनके अ“ङ्नामे अकेली दैक्ती बरबरैटी रह“ु । महिन दांैकट सुन्के घरेक भित्तरसे निकर्के सक्कु जाने महिन भगभग भगभग हेर्ती रहै ।

दोसर जहनसे भोज कर्ना सायद ईसाके आपन बाध्यता रहल हुईहिन । मने मै भरखर जन्नु कि आपन हुईना मनै फे अईसिन रहठै । ईण्डिया जाई बेर – “ यि कु“वारी मथ्वा“ रचाई हाली अईहो ना सनम ”  कहुईया ईसा आज महिन बेहत्तर पागल बनाके गैली । आज यि जिवन ईसा विना क¥या बद्री छाईल रात असक अन्धार लग्टी बा । सुनशान बा मोर बस्ती । मै सडक गल्ली कोन्वामे अकेली निगतु पागलके तरह । फाटल झुल्ला ओ पेउ“डाहा पैन्ट घल्ले भिखमंङ्गा मनैन्के तरह आज मोर जीवन छुछ्ले बोतल पकर्ले गण्डा मरुभुमीमे घुम्टी बा । बिशुद्घ संस्कारके रंगमञ्चमे मोर असली  जीवनलिला नौटंकी नाच असक प्रदर्शन हुईटी बा, विना दर्शक । मुकदर्शक बन्के हेर्ती बाटै हिटलर, लैला मञ्नु, जुलिट रोमियो, मुना मदन ओ प्रेमके पक्का पुजारी हुक्रे ।  मोर बा“की जीवनयात्रा कहा“ जाके बिश्राम लेहठ उ फे पत्ता नाई हो । गन्तब्यहिन मोर जीवन अनन्तकाल समके लाग बिना अर्थक सफर कर्टी बा……………… कर्टी बा……………… कर्टी बा…………….. ।