पहुनी

पहुनी

–छविलाल कोपिला
मैं देख्लुँ,
उप्टाबैशसे भरल्
ऊ लावा पहुनीक कथा
ओ देख्लुँ हुँकारमे,
पल–पल शब्द–भावके वयाल स्पर्श करट्
अंग–अंगमे भूँइचालके तरंग उठट्
घुर्घुटीले कोकन टोपके शरमाइट्
ओ सुहागरातके मीठ कल्पनामे हेराइट्
जहाँ ऐनामे भ्रामक सुन्दरता बिल्गाइटहे ।

मैं ऊ फेन देख्लुँ
ऊ कर्निडिया रातमे
झँकियाके हेरे आइल् मोंकक् केरनीसंगे
नाबालक पतिके अबोध अनुहार बार–बार हेरट्
डँडुर मैयाँ ओ मीठ कल्पना जूर–जूर हुइटी
ओ कैयांै रात कच्चे आँख बिहान हुइट् ।
ओस्टक नैनी तालमे आँसके छाल उठट्
ओ बर्सट् देख्लुँ सावन
आँखिक बर्हनिक छरनीतिरसे
जहाँ कुम्भकर्ण निद्रीक आगे
चुरियक मधुर झन्कार फेन हेराइट् कहोंर–कहोंर ?
हो यिहे पीडा, यिहे कर्मना
ऊ आपन पनवाँदार गोंरीमे सजैटी रही
ओ सतरंग गोंडरीमे बिन्टी रही
मुले, के बुझी हुँकार जीयाके बात ?

विचरी ! मुँह फोरे नै सेक्ली ते का ?
हुँकार फेंच्रार झोटीमे बैश फुलट देख्लुँ
सिँर्हट्टक फुन्नामे सप्तरंगी इन्दे्रणी झुलट देख्लुँ
बिँरक फुल्रामे जवानी उल्रट देख्लुँ
ओ देख्लुँ,
कुवाँक टक्ठापरसे पानीमे बौनी
जे खिलखिला हाँसी हँस्टी रही ।

हो, उहे मधुर मुस्कानके खातिर
रोश्नी आँखिक सन्की नजर मारट्
ओ कैयौं लोभौरी हाँठ नफाइट् देख्लुँ
जवानी फेंक्रल फुला टुरक लग,
चाहना, बयालके रफ्तार
बार–बार दौरट् देख्लुँ
ऊ सुन्दर सपना अँछोरक लग,
सयानी हौका–बयाल न हो
कबो यहोंर लहराइठ्, कबो ओंहोंर छल्कठ्
सायद यी फेन देख्लुँ
पुन्वाँसी रातके ऊ ओजरियामे
बार–बार अज्ञात आकृति
हुँकार छल्कल बैश उठाइट ।

हो, मोरठन ऊ साँखी–बयान बा
सोच्ले रहुँ,
कौनो दिन कचेहरीमे पेश करम कैह्के
झोँटीमे अँट्कल् कुर्कट
घुरौरापर बिछाइल गटिया
डन्गाके अँट्कल झोबन्डा
झुलवामे चप्ट्याइल टिक्ली
ओ बेन्हवाँ फन्कलक पदचाप ।

जब, मै देख्लुँ,
हुँकार बिनल् पनवाँदार नुइयाँ, सुप्लीसंगे
नन्दिया बुक्रीबाला खेलट्
सतरंग गोंडरीमे लेल्हारा बैठल्
ओ ढकियामे पहुरा लेके पहुनी खाइ जाइट्
संगे ऊ फेन देख्लुँ,
बहटी पवनमे जवानी फर्फराइट अँचरा
छातीम् पून्वाँसी रात चम्कट चँदरहार
अनुहारमे बिहान उठट् माथके मगिया
नाकेम् आकांक्षाके बहला झुलट् नठियाँ
कानेम् सपनाके सितारादार झालर हस्
झिल्मिलाइट झिलमिलिया
हाँठेम् सुन्न सोहावन ऊ चुरिया
ओ गोरामे मधुर संगीतके झन्कार ऊ पैंरी
जहाँ देख्लुँ मैं हुँखिनहे पूरा पहुनी ।