माटीक शरिर

माटीक शरिर

यी टे माटीक शरिर माटीम मिलजाई।
कमाईल नाम ओ करल बदनाम रैहजाई।।
सुग्घर देखके सुँघेक नाई परी।
मन मिली टे अपनही मन परजाई।।
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रंगी बिरंगी फुलक बगिया जवानी।
सम्हारो चाहे समर्पन करो जिन्गी।।
आझ बा आझि उराउ का मतलव।
बेचो चाहे बचाउ फरक नाई परी।।
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यी टे माटीक शरिर माटीम मिलजाई
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जवान भर आखी तुमके जवानी लुताउ।
टुटी दिल आँसे आँसमे जिन्गी कताउ।।
रसगर सुग्घर शरिर सुख जाई।
करिया कुचिल अन्धरिया आईजाई।।
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सुझ बुझके काम कर्ना सुझथ नाई।
हडबडमे लडबड हुजाईथ जबफे।।
लोभी लजर हमार हाली लोभाईथ।
तबमारे पैना भर डत्से दुख पाईथ।।
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यी टे माटीक शरिर माटीम मिलजाई।
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नारी नारीनेके लुट्ना नारीत्व।
लजर लजाईथ देखथ जब पुर्षोत्व।।
लाल लुग्गा लगाके लौली दुल्ही।
सजल डोलीम सजके पुग्ली घर सजना।।
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हुईल पियाक प्यारमे जलम घर पराई।
हर बातमे हरदम हुईथ लराई।।
हेराईल छुटल ऊ छोटेक हाँसी।
लरबराईथ जिन्गी लगाई परथ फाँसी।।
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यी टे माटीक शरिर माटीम मिलजाई।
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न हेरो न छेरो चलता चले देउ।
ऊधारी मे उधर जाई एकदिन।।
सुधरी टे सुधर्हो सेकल सम।
लगैना भर लगाउ दम जिन्गी बचैना नाई बची।।
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यी टे माटीक शरिर माटीम मिलजाई।
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(मिथ्थु थारू जी के बनाईल मुर्ति)